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राजस्थान: देश की पहली अंडरग्राउंड माइंस, जहां दौड़ती है एसयूवी

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी जिंक खान में पहुंचा भास्कर

Danik Bhaskar | Sep 02, 2018, 07:54 AM IST
फोटो : प्रेम उपाध्याय फोटो : प्रेम उपाध्याय

भीलवाड़ा. खदान के नाम पर हमारे जेहन में एक ही तस्वीर आती है। हाथों से खुदाई करते मजदूर और ट्रॉली में मिनरल भरकर ले जाते हुए श्रमिक। लेकिन ये अंडरग्राउंड माइंस अलग है। यह तस्वीर है दुनिया की तीसरी बड़ी जिंक खान की। यह है आगूचा क्षेत्र की हिंदुस्तान जिंक लि. की माइंस।

इसमें 900 मीटर की गहराई पर खुदाई करके जिंक, लेड और सिल्वर निकाली जा रही है। यह देश की एक मात्र ऐसी अंडरग्राउंड माइंस है, जिसमें एसयूवी गाड़ी में बैठकर एसी का आनंद लेते हुए गहराई में हो रही खुदाई को देख सकते हैं। उत्पादन और तकनीक सभी में यह देश की अव्वल दर्जे की खान है। यहां आस्ट्रेलिया से मंगाई आठ करोड़ रुपए की जंबो मैकेनाइज्ड मशीन से खुदाई होती है, जो 100 फीसदी कंप्यूटराइज्ड है। यहां धरातल से जैसे-जैसे नीचे जाएंगे हर किलोमीटर पर तापमान में 20 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है। यहां सांस लेने में परेशानी न हो इसके लिए 900 मीटर नीचे तक एक बड़ा शाफ्ट लगाया गया है। इसके विशालकाय पंखे बाहर से फ्रेश एयर को अंदर खींचते हैं। अंदर से कार्बन डाइ ऑक्साइड को भी बाहर निकाला जाता है। काम करने वालों के साथ हर समय ऑक्सीजन सिलेंडर होता है।

खुदाई करने के साथ-साथ छत पर मशीन से सीमेंट का लिक्विड स्प्रे किया जाता है ताकि छत मजबूत रहे और कोई हिस्सा ढहे नहीं। 450 मीटर गहराई के बाद मिनरल शुरू हो जाता है। माइंस में किसी भी तरह की इमरजेंसी में बचाव के लिए निर्धारित दूरी पर रिफ्यूज चैंबर हैं। खदान ढहने या अंदर किसी भी तरह की आपातकालीन स्थिति में एक चैंबर में पांच लोग 36 घंटे तक जीवित रह सकते हैं। एयर कंडिशंड होने के साथ-साथ इसमें ऑक्सीजन सिलेंडर, बिजली, खाने-पीने के लिए भी व्यवस्था रहती है। इस तरह की माइंस भारत में इकलौती है। विश्व में दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, ईरान, कनाडा में भी इस तरह की माइंस हैं। जिंक लोहे को जंग रोधक बनाने, मेडिसिन, फर्टिलाइजर, ब्यूटी प्रोडक्ट बनाने सहित रोजमर्रा की अधिकांश चीजों में काम में ली जाती है।

ग्रेडिंग के लिहाज से यह दुनिया की तीसरी बेहतरीन खदान है। पहली उत्तरी अमेरिका महाद्वीप में अलास्का (कनाडा) और दूसरी मध्य एशिया के ईरान में स्थित है। आगूचा माइंस की मैटल वैल्यू 15 प्रतिशत है। यहां 25 मार्च, 1991 में लेड, जिंक की खुदाई शुरू हुई थी। 11 अप्रैल, 2002 में इसे वेदांता लिमिटेड ने खरीद लिया। इससे पहले यह सरकारी उपक्रम था। अभी इसमें करीब 68 प्रतिशत शेयर वेदांता के हैं।

- खदान में फोटोग्राफी की मनाही है। भास्कर ने विशेष प्रयास से यह फोटो लिया। भास्कर के दो रिपोर्टर व फोटो जर्नलिस्ट माइंस में 650 मीटर नीचे तक गए। यहां धरातल से 13 डिग्री सेल्सियस ज्यादा तापमान था।