गांव में में पली बढ़ी किसान की बेटी ने कॉलेज में क्रिकेट खेलना शुरू किया, अब यूनिवर्सिटी कैप्टन

3 वर्ष पहले
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  • ग्रामीण परिवेश की खिलाड़ी ने जज्बे से बल्ला थामा तो फिर पीछे हटकर नहीं देखा

श्रीगंगानगर. यह कहानी है गांव की एक ऐसी लड़की की जिसने अपनी कड़ी मेहनत से राज्यभर में नाम कमाया है। गांव में खेल मैदान नहीं था और जिन सरकारी स्कूलों में पढ़ाई हुई, वहां भी खेल सुविधाओं का अभाव। अभावों में जूझती कॉलेज पहुंची तो हिचक के साथ क्रिकेट शुरू किया। फिर शुरू हो गए संघर्ष के दिन। ग्रामीण परिवेश की खिलाड़ी ने जज्बे से बल्ला थामा तो फिर पीछे हटकर नहीं देखा। चार साल में संघर्ष की बदौलत बीकानेर यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम की कैप्टन बनकर इंटर यूनिवर्सिटी किक्रेट प्रतियोगिता में टीम का नेतृत्व किया। इस तरह जुनून के साथ सफलता की कहानी लिखी है जिले के गांव हुणतपुरा की खिलाड़ी कांता माहर ने। 

 

साधारण किसान परिवार की बेटी और ठेठ ग्रामीण परिवेश में पली कांता को बचपन से ही ज्यादा सुविधाएं नहीं मिली। इसके बावजूद उसने जीवन में मिले मौकों का मेहनत की कसौटी पर पिघलाकर प्रतिभा का लोहा मनवा दिया। मेहनत की बदौलत कांता को वर्ष 2017 में पहली बार भोपाल में हुई इंटर यूनिवर्सिटी में क्रिकेट प्रतियोगिता में बीकानेर यूनिवर्सिटी की टीम में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला।

 

ओपनर बैट्समैन और विकेटकीपर के रूप में कांता की भूमिका सराहनीय रही। वर्ष 2018 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुई इंटर यूनिवर्सिटी क्रिकेट प्रतियोगिता में फिर परफॉर्मेंस दिखाई तो इस साल नागपुर में हुई इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में बीकानेर यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम की कैप्टन बनाई गई। कांता की ओपनिंग बल्लेबाजी ग्रामीण परिवेश की अन्य छात्राओं के लिए रोल मॉडल बनी। इस बार यूनिवर्सिटी की क्रिकेट टीम में चार अन्य छात्राएं भावना, पारूल, कविता और रवीना भादू भी शामिल हुई हैं।

 

2014 में थामा बल्ला,साथी खिलाड़ी अनुभवी थी, उन्हीं से सीखे बॉल पर नजर टिकाने के गुर

 

पांचवीं तक तक पढ़े सामान्य किसान वेद प्रकाश और अशिक्षित रुकमा देवी की बेटी कांता की स्कूलिंग ग्रामीण परिवेश में सरकारी स्कूलों में हुई। बचपन में अपने दोनों भाइयों अनिल और सुनील को क्रिकेट खेलते देखती तो उसका मन भी बल्ला थाम कर शॉट लगाने को करता। गांव के स्कूल में क्रिकेट के प्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं थी। न ही साथ की लड़कियां खेलने को तैयार होती।

 

वर्ष 2014 में बींझबायला के सरस्वती गर्ल्स कॉलेज में बीए प्रथम वर्ष में एडमिशन लिया तो क्रिकेट खेलने का मौका मिला। तब मौके के साथ नई चुनौतियां भी सामने आईं। लड़की किक्रेट खेलेगी, इस पर परिवार को थोड़ी हिचकिचाहट हुई। फिर परिवार के मन में संशय हुआ कि यूनिवर्सिटी स्तर पर लेदर की बॉल से क्रिकेट खेलने से चोट लगने का जोखिम रहेगा। परिवार के लोगों ने उसकी पीठ थपथपाई तो नई चुनौती सामने आई कि सहपाठी छात्राएं अनुभवी खिलाड़ी थीं। टीम में उनके बराबर स्थान बनाए रखने के लिए शुरुआत से ही जद्दोजहद करनी पड़ी। लेकिन संघर्ष की पिच पर उतरी कांता पीछे नहीं हटी। वर्तमान में चौधरी बल्लूराम गोदारा राजकीय कन्या महाविद्यालय में एमए अंतिम वर्ष की छात्रा है। 

 

फोटोज- मांगीलाल

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