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गंभीर घायलों को वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, डिफीब्रीलेटर तो दूर, स्ट्रेचर तक नहीं मिल रहे, कंधों के सहारे लाते हैं तीमारदार

आरएनटी मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित संभाग के सबसे बड़े एमबी-बाल चिकित्सालय में संभाग के छह जिलों सहित पड़ोसी...

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 07:05 AM IST
गंभीर घायलों को वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, डिफीब्रीलेटर तो दूर, स्ट्रेचर तक नहीं मिल रहे, कंधों के सहारे लाते हैं तीमारदार
आरएनटी मेडिकल कॉलेज के अधीन संचालित संभाग के सबसे बड़े एमबी-बाल चिकित्सालय में संभाग के छह जिलों सहित पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश से हर साल तीन लाख से ज्यादा मरीज बेहतर इलाज की आस में आते हैं, लेकिन यहां सभी आपात सेवाएं वेंटिलेटर पर हैं।

सड़क हादसों में गंभीर घायल और अन्य बीमार मरीजों को एंबुलेंस से इमरजेंसी में ले जाने और इमरजेंसी से ट्रोमा, कार्डियोलॉजी, बाल चिकित्सालय पहुंचाने के लिए स्ट्रेचर तक नसीब नहीं होते हैं। कागजों में 131 स्ट्रेचर और पर्याप्त ट्रॉली मैन मौजूद हैं। तीमारदार दर्द से कराहते और बेसुध मरीजों को कंधों के सहारे डॉक्टरों के पास लेकर जाते हैं, क्योंकि ट्रॉलीमैन बिना सिफारिश हिलते तक नहीं। पोर्टेबल वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, डिफीब्रीलेटर जैसे जरूरी उपकरण भी नहीं हैं। कई गंभीर मरीजों की नब्ज टटोलने पर बीमारी का पता नहीं लग पाता है। दूसरी ओर, अस्पताल अधीक्षक डॉ. विनय जोशी का कहना है कि इमरजेंसी के लिए दो मॉनिटर, दो ईसीजी मशीन और दो डिफीब्रीलेटर खरीदने के ऑर्डर जारी कर दिए हैं। खराब मॉनिटर रिपेयरिंग के लिए भेज दिया है। ये जल्द ही उपलब्ध करा दिए जाएंगे।

लाइव : स्ट्रेचर के लिए भटकते रहे परिजन, किसी ने नहीं की सुनवाई

दोपहर 1.15 बजे : किडनी का ऑपरेशन कराकर एंबुलेंस से इमरजेंसी पहुंचे कांकरोली निवासी 48 वर्षीय प्रभुलाल को स्ट्रेचर नहीं मिला। वहीं पेट की बीमारी से पीड़ित वल्लभनगर निवासी 16 वर्षीय रेशमा को भी स्ट्रेचर नहीं मिला। यही परेशानी अन्य कई मरीजों के साथ हुई। परिजनों ने बताया कि स्ट्रेचर के लिए वे 15-20 मिनट तक इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन उनकी आवाज किसी ने सुनी ही नहीं।

इमरजेंसी से ट्रोमा, कार्डियोलॉजी आईसीयू में पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं मरीज : सड़क दुर्घटनाओं में घायल, हृदय घात, अपेंडिक्स आदि के हजारों मरीज नाजुक हालत में इमरजेंसी में पहुंचते हैं। मास कैजुअल्टी के शिकार 05-10 मरीज एक साथ नाजुक हालत में यहां पहुंचते हैं तो पोर्टेबल वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, डिफीब्रीलेटर की कमी से जूझ रही इमरजेंसी की ही सांस फूल जाती है। मरीजों की जांच में ही 15-25 मिनट लग जाते हैं। कई मरीज उपकरणों के अभाव में इमरजेंसी से ट्रोमा, कार्डियोलॉजी आदि विभागों के आईसीयू में पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।

जिस वक्त किशोरी काे लाया गया, परिजनों को स्ट्रेचर नहीं मिल पाया।

मॉनिटर : पल्स, बीपी, ब्लड में ऑक्सीजन सेचुरेशन की स्थिति, श्वसन दर आदि की सटीक जानकारी सैकंडों में दे देता है।

पोर्टेबल सोनोग्राफी : अपेंडिक्स, गाल ब्लेडर, किडनी आदि की जांचकर तुरंत कर मरीज को जान लेवा दर्द से राहत दे सकते हैं।

डिफीब्रीलेटर : धड़कन बंद होने जैसी स्थिति में डीसी शॉक देते हैं, जिससे दिल फिर से धड़कने लगता है।

पोर्टेबल वेंटिलेटर : गंभीर मरीज को कृत्रिम श्वास दे ऑब्जरवेशन में रखकर उपचार कर सकते हैं।

पोर्टेबल वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, मॉनिटर, डिफीब्रीलेटर ऐसे बचा सकते हैं मरीजों की जान

मॉनिटर : पल्स, बीपी, ब्लड में ऑक्सीजन सेचुरेशन की स्थिति, श्वसन दर आदि की सटीक जानकारी सैकंडों में दे देता है।

पोर्टेबल सोनोग्राफी : अपेंडिक्स, गाल ब्लेडर, किडनी आदि की जांचकर तुरंत कर मरीज को जान लेवा दर्द से राहत दे सकते हैं।

डिफीब्रीलेटर : धड़कन बंद होने जैसी स्थिति में डीसी शॉक देते हैं, जिससे दिल फिर से धड़कने लगता है।

पोर्टेबल वेंटिलेटर : गंभीर मरीज को कृत्रिम श्वास दे ऑब्जरवेशन में रखकर उपचार कर सकते हैं।

पोर्टेबल वेंटिलेटर-सोनोग्राफी, मॉनिटर, डिफीब्रीलेटर ऐसे बचा सकते हैं मरीजों की जान

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