350 साल पहले सुरक्षा के लिए बना था 9 किमी लंबा नगरकोट, इसमें प्रवेश के लिए चांदपोल, सूरजपोल सहित 12 दरवाजे बने

Udaipur News - धरोहरों अाैर स्मारकों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए झीलों की नगरी उदयपुर में 19 से 25 नवंबर तक विश्व धरोहर सप्ताह मनाया...

Nov 22, 2019, 11:31 AM IST
धरोहरों अाैर स्मारकों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए झीलों की नगरी उदयपुर में 19 से 25 नवंबर तक विश्व धरोहर सप्ताह मनाया जा रहा है। उदयपुर की दीवारें, सड़कें, झीलें, महल, दरवाजे से लेकर पुलिया तक भी धरोहर की तरह हैं। सिटी भास्कर आज आपको रूबरू करा रहा है लेकसिटी में धरोहर के रूप में मौजूद 350 साल पुराने पाेल अाैर दरवाजों से जिनकी अपनी अलग पहचान, कहानी, वजूद और इतिहास है।

इन्हें देखने देश दुनिया से पर्यटक आते हैं। रखरखाव नहीं होने से आज इन पोल्स की खूबसूरती घटी है। कई जगह प्रशासन देखरेख का काम करा रहा है। अम्बापाेल, बह्मपाेल, चांदपाेल, सत्तापाेल, रामपाेल, दिल्लीगेट, हाथीपाेल, सूरजपाेल, उदयपोल अाैर किशनपोल सहित शहर के 12 हेरिटेज पोल और दरवाजे हैं। भू-विज्ञानी डॉ. पुष्पेंद्र सिंह राणावत बताते हैं कि मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा अमर सिंह द्वितीय ने 1672-1710 में सुरक्षा की दृष्टि से 9 किमी लंबा, 5 मीटर ऊंचा और 2 मीटर चौड़ा परकोटा (नगर कोट) बनवाना शुरू किया था। जिसे उनके उत्तराधिकारी महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने 1733 में पूरा करवाया। नगर कोट में प्रवेश के लिए एक साथ इन सभी 12 दरवाजों का निर्माण हुअा जो आज दक्षिण से पीछाेला किनारे तक हनुमान पोल, रामपोल, किशनपोल, उदयपोल, सूरजपोल, दिल्ली गेट, दंडपोल, हाथीपोल, चांदपोल, सीतापोल, अम्बापोल और ब्रह्मपोल के रूप में हैं।

उदयपुर. 9 किमी लंबा नगरकोट जिसके अंतर्गत 12 दरवाजे बनाए गए हैं।

निम्बाहेड़ा के पत्थरों से बदल रहे, सुरक्षा के लिए सभी में कोटिंग होगी

अम्बापाेल

मानस ने बताया कि पुराने समय में सभी इमारतें का निर्माण चूने से करवाया गया है। इस कारण सीमेंट के बजाय चूने से घुटाई, चुनाई अाैर प्लास्टर का कार्य हाे रहा है। दरवाजे में जाे पत्थर टूट चुके हैं उन्हें निम्बाहेड़ा के पत्थराेंें से बदलने का कार्य हो रहा है। इन सभी इमारताें की सफाई कर पत्थराें पर अल्ट्रा वायलेट काेटिंग की जाएगी जाे भविष्य में इमारत की सुरक्षा का काम करेगी। कार्य पूरा हाेने के बाद पर्यटकों के लिए बैठने की व्यवस्था अाैर दरवाजों से जुड़े इतिहास का शिलालेख रखा जाएगा।

सभी दरवाजों और पोल का है अपना वजूद, इतिहास और महत्व

इतिहासकार डाॅ. चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं कि पुराने दाैर में सभी इमारताें के नाम घटनाअाें के अाधार पर रखे गए थे। दक्षिण दिशा में दिल्ली के रास्ते पर बना दिल्ली गेट एक अनोखी दृष्टिकोण पर तैयार किया गया है। दिल्ली से ही मुगल सल्तनत अाैर अंग्रेजी हुकूमत की शुरुआत हुई थी। फतह सिंह का मानना था कि मेवाड़ के लाेग दिल्ली के रास्ते पर मरने के बाद ही जाएंगे। इस कारण कब्रिस्तान भी उसी दिशा में बनाया गया था। इसी तरह सूर्य का उद्गम पूर्व से हाेता है इस कारण पूर्वाभिमुख दिशा पर सूरजपोल अाैर पश्चिम दिशा में चांदपोल का निर्माण हुअा। हाथीपोल एक प्रकार का सिम्हा-द्वार है जाे बेहतर सुरक्षा के लिए बाहरी द्वार समकोण पर एक आंतरिक द्वार के साथ डबल-गेटेड है। नवगठित महाराणा अपने प्रवेश के बाद इस द्वार की पूजा करते थे।

दरवाजों की नक्काशी घिस गई, 5 करोड़ से बढ़ा रहे हैं खूबसूरती

स्मार्ट सिटी के हेरिटेज कंजर्वेशन प्लान के तहत 2 माह से सभी ऐेतिहासिक दरवाजों की हालत सुधारने का काम किया जा रहा है। 5 कराेड़ के खर्च से सुधर रहे 10 दरवाजों में अम्बापाेल, बह्मपाेल, चांदपाेल, सत्तापाेल अाैर रामपाेल पर कार्य किया जा रहा है। दिल्लीगेट, हाथीपाेल, सूरजपाेल, उदयपोल अाैर किशनपोल पर काम जल्द शुरू हाेगा। इस प्लान के आर्किटेक्चर एक्सपर्ट मानस शर्मा ने बताया कि 350 साल पुराने दरवाजों पर पुरानी नक्काशी अाैर कलाकारी शामिल हैं जाे रखरखाव नहीं हाेने के कारण लुप्त हाेने की कगार पर है।

चांदपाेल

सीतापोल

ब्रह्मपोल

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