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‘स्नेहाधीन’ ने दिखाई गलतफहमियों से रिश्तों के दरकने की हकीकत

एक वर्ष पहले
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भारतीय लोक कला मंडल में बुधवार को गुजराती नाटक स्नेहाधीन का मंचन हुआ। कलाकारों ने गलतफहमियों से रिश्तों के दरकने की हकीकत को बखूबी दर्शाया। निदेशक डाॅ. लईक हुसैन ने बताया कि अशोक पाटोले के लिखे इस नाटक का रूपांतरण प्रवीण सोलंकी और निर्देशन अख्तर सैयद ने किया। गांधीनगर के दल ने कहानी काे जीवंत किया।

सामंजस्य और भाईचारे को दर्शाने वाला नाटक स्नेहाधीन गुजराती संस्कृति भी दिखाता है। कहानी एक सामान्य परिवार पर आधारित है, जिसमें एक पिता परिवार के पालन-पोषण के लिए विदेश जाता है। अरसे बाद उसकी वतन और घर वापसी होती है, लेकिन परिवार से दूर रहने के कारण पिता से पुत्र का प्रेम कम हो जाता है। इनके रिश्ते में दरार आ जाती है। पिता को गैर जिम्मेदार समझने वाला पुत्र नफरत करने लगता है। पिता को बेटे की यह नफरत घर वापस अाने पर दिखाई देती है। तनाव और नफरत देखकर वह नहीं चाहते हुए भी वापस विदेश जाने का फैसला कर लेता है। इसी दौरान पिता का पुराना मित्र उनके घर आता है। अपने मित्र की यह स्थिति देख कर वह उसके पुत्र से बातचीत करता है। कहता है कि तुम्हारी परवरिश और पढ़ाई-लिखाई अच्छी हो सके, इसलिए तुम्हारे पिता अरसे तक परिवार से दूर रहे। जब सारी हकीकत पुत्र को पता चली तो उसे काफी पछतावा हुआ। उसने पिता से बुरे बर्ताव के लिए माफी मांगी और वापस विदेश नहीं जाने का आग्रह किया। अंतत: परिवार के सदस्य भाव-विभोर होकर एक-दूसरे से मिलते हैं। नाटक में अख्तर सैयद, विश्वा रावल, योगेश राठी, प्रतीक कपाड़िया, दिव्यकांत वर्मा, आदिल सैयद आदि कलाकार थे।

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