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राजस्थानी 8वीं अनुसूची की भाषा नहीं हो सकती, मांग सिर्फ रूमानियत, पहले बोलचाल में लाएं : ओम थानवी

2 वर्ष पहले
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राजस्थान साहित्य महोत्सव “आड़ावल’ में रविवार को एक बयान के बाद तकरार शुरू हो गई। “विदेशी/भारतीय भाषा साहित्य रौ राजस्थानी भाषा में अनुवाद’ विषय पर हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, जयपुर के कुलपति ओम थानवी ने कहा कि राजस्थानी भाषा को संविधान की 8वीं अनुसूची में दर्ज कराने की बात और सरकारी भाषा बनाने की मांग एक रूमानियत है। राजस्थानी भाषा संविधान की अाठवीं अनुसूची की भाषा नहीं हो सकती, क्योंकि ये बोल-चाल की भाषा नहीं है। मैं आज अगर राजस्थानी में बोलूं तो कौनसी राजस्थानी में बोलूं। सेक्टर-4 स्थित राजस्थान साहित्य अकादमी में थानवी ने गियर्सन को उद्धरित करते हुए कहा, राजस्थानी में 72 तरह की बोलियां हैं, लेकिन मुझे लगता है कि इससे भी ज्यादा हैं। ये अनुसूची की भाषा बने या न बने, लेकिन इसे बोलचाल की भाषा बनानी होगी। हम राजस्थानी भाषा का एक रूप बना सकते थे, लेकिन अब देर हो चुकी है। आज अभिभावक बच्चों को हिंदी छोड़, अंग्रेजी भाषा सिखा रहे हैं और हम राजस्थानी की बात कर रहे हैं। राजस्थानी भाषा किसी को रोजगार नहीं दिला सकती ताे कोई काम की नहीं। इधर, थानवी के बयान पर कार्यक्रम निदेशक और मोट्यार परिषद के अध्यक्ष शिवदान सिंह जोलावास ने कहा कि थानवी की ये बातें विषय से इतर थीं। हमारा विषय अलग था।

राजस्थानी भाषा मान्यता विषय नहीं लिया : शिवदान सिंह जोलावास

वक्ता ओम थानवी के राजस्थानी भाषा 8वीं अनुसूची में शामिल नहीं हो सकती वाले बयान पर कार्यक्रम निदेशक शिवदान सिंह जोलावास ने भास्कर को बताया कि चार दिवसीय इस कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़ा काेई विषय नहीं लिया। थानवी ने विषय से इतर ये बातें कही हैं। हमारा विषय अलग था। हमने थानवी को इस विषय की जानकारी ई-मेल के जरिए पहले ही दे दी थी।

सूची में शामिल करने से राजस्थानी भाषा का भला नहीं होगा : मधु आचार्य

वरिष्ठ साहित्यकार मधु आचार्य ने कहा कि अगर राजस्थानी भाषा को संविधान की सूची में शामिल कर लें, तो भी इस भाषा का भला नहीं हो सकता। इससे स्कूल-कॉलेजों में राजस्थानी भाषा के 2-4 शिक्षक लगा देंगे, लेकिन वहां किनके बच्चे प्रवेश लेंगे? पहले हम बच्चों को तो सिखाएं राजस्थानी। आचार्य ने भी राजस्थानी को पहले बोलचाल की भाषा बनाने पर जोर दिया। वरिष्ठ साहित्यकार भंवरसिंह सामाेर ने थानवी को प्रतीक चिह्न भेंट किया। कार्यक्रम निदेशक जोलावास भी मौजूद थे। उन्होंने थानवी और आचार्य से संबंधित विषय पर कई सवाल भी किए।

आयोजक बोले- थानवी की ये बातें विषय से इतर, हमारा विषय अलग

अणबोली टीस का विमोचन

कार्यक्रम में साहित्यकार तरुण कुमार दाधीच के राजस्थानी में रचित खंड काव्य “अणबोली टीस” का विमोचन भी हुअा। साहित्यकार नारायण सिंह, बसंत सिंह सोलंकी, आईदान सिंह भाटी, मनोहर सिंह, ओम थानवी, मधु आचार्य, नितिन गोयल, शिवदानसिंह जोलावास आदि बतौर अतिथि माैजूद थे।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा

आधुनिकता आने पर राजस्थानी कविताओं को मिलेंगे श्रोता और पाठक : भाटी

साहित्यकार भंवरसिंह सामोर ने कहा कहा कि साहित्य भाषा का दूसरा नाम है डिंगल और ब्रज की भाषा में लिखा राजस्थानी स्वरूप है पिंगल। मायड़ भाषा जानने के लिए डिंगल-पिंगल साहित्य जानना जरूरी है, क्योंकि राजस्थानी में कोई भी ऐसी घटना नहीं, जिसमे छंद न हो और ऐसा कोई छंद नहीं, जिसमें घटना न हो। बीकानेर साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. नितिन गोयल ने कहा कि हमारी भाषा पहले इसलिए विकसित थी, क्योंकि जन की भाषा में ही लोगों के लिए आदेश निकलते थे। आज प्रशासन से अंग्रेजी में निकलने वाले आदेश ग्रामीणों तक पहुंचते-पहुंचते अप्रासंगिक हो जाते हैं। यही प्रवृत्ति भाषा को खुद से दूर अाैर कमजाेर करने की जड़ है। साहित्यकार आईदान सिंह भाटी ने कहा कि राजस्थानी कविताओं में आधुनिकता आने पर उसे श्रोता भी मिलेंगे और पाठक भी। शाम को राजस्थानी लोक नृत्य संध्या हुई। विजय लक्ष्मी आमेटा ने घूमर और लोक गीतों पर प्रस्तुति दी। साथ ही अन्य कलाकारों ने लोक गायन और गेर नृत्य प्रस्तुति दी। इस मौके पर विजयलक्ष्मी अामेटा काे पुरस्कार स्वरूप 51 हजार रुपए दिए गए।

समापन आज : महोत्सव का समापन सोमवार को होगा। खेल, कला और विज्ञान के क्षेत्र में राजस्थान के योगदान, देश के आर्थिक विकास में प्रदेश के योगदान पर साहित्यकारों के अलावा एथलीट कृष्णा पूनिया और माला सुखवाल विभिन्न सत्रों में अपनी बात रखेंगे।

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