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शौर्य का उत्सव है मेनार की गेर, अंचल में होरी-रसिया के नेह निमंत्रण

एक वर्ष पहले
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रंग पंचमी से फाग का उल्लास बिखेर रहा मेवाड़ होली और रंगोत्सव के लिए तैयार है। होलिका दहन सोमवार देर शाम होगा, जबकि धुलंडी मंगलवार को मनाई जाएगी। मेवाड़ में रंग पर्व से जुड़ी परंपराएं भी कम रोचक-रोमांचक नहीं हैं। यहां रंग तेरस तक अलग-अलग जगह रंग बरसते हैं। मंदिरों में चंग-उपंग, झांझ-मंजीरे की धुनों और होरी-रसिया गायन पर श्रद्धा झूमती है। इनमें मिलने के गीत हैं तो युद्ध के भी गीत हैं। गालियां हैं और नेह के निमंत्रण भीं। आग उगलती बंदूकों, टन्न से टकराती तलवारों वाली मेनार की जबरी गैर शौर्य का विजय का उत्सव है तो भाणदा की दिलचस्प ढोल दौड़, वाना के नेजा जैसे मनोरंजक मुकाबले भी। राजसमंद में नाथद्वारा के श्रीनाथजी सहित तीनों प्रमुख पीठ के मंदिर हों या वागड़ में भीलूड़ा गांव, पढ़िए मेवाड़ में कहां कैसे मनाई जाती है होली।

होली : करकेला में सिर्फ नारियल का दहन, इसकी ज्वाल है दहन का संकेत

सराड़ा क्षेत्र में सबसे पहले करकेला धाम की होली जलती है। सिर्फ नारियल का दहन होता है। ज्वाल कई मील तक दिखती है, जो इस दायरे के गांवों में होलिका दहन का संकेत है। उधर झाड़ोल (फलासिया) में भी ऐसी ही परंपरा है, जहां आवरड़ा की पहाड़ियों के बीच कमलनाथ की होली जलने के बाद गांवों में होलिका दहन होता है।

धुलंडी : पुष्टिमत के मंदिरों में इस दिन के बाद सालभर काम नहीं लेते अबीर

अंचल में रंग तेरस तक रंग खेलने की परंपरा है, लेकिन पुष्टिमत के श्रीनाथजी, विट्‌ठलनाथजी, द्वारकाधीश सहित बदराणा के हरिहर धाम, फतहनगर के द्वारकाधीश मंदिर में धुलंडी के बाद गुलाल-अबीर नहीं खेला जाता। शाम को इन मंदिरों में सफाई के बाद अबीर का उपयोग नहीं होता। वापस अगले साल रंग पंचमी से फाग शुरू होता है।

और होता है यह सब भी....

{लोक संस्कृति के जानकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं कि मेवाड़ में फाग का हर रंग है। भीलूड़ा की कंडों की राड़, बरसाना की तरह बरुंदनी (भीलवाड़ा) की लट्‌ठमार होली, नाथद्वारा में मुखौटे लगाकर स्वांग, आमेट के जयसिंह श्याम मंदिर की रंग यात्रा, दाढ़ी से मंदिर की देहरी बुहारने के शाही स्वांग यहां रंगोत्सव का उल्लास दोगुना करते हैं। मेनार समेत वाना, रुंडेड़ा, नवानिया, ईंटाली, वल्लभनगर, खेरोदा, लालावास, चौकड़ी गांव में अलग-अलग दिन गेर रमती है। गायन में भी कालबेलिया समाज का गीत लाल केसिया और मंदिरों में हवेली संगीत, ध्रुपद के पद प्रमुख हैं। शोक निवारण के लिए यहां रंग बदलने की परंपरा है, जबकि बेटा-बेटी की समानता का संदेश देती ढूंढ की रस्म भी है।

सहित अन्य राज्यों में बसे क्षेत्रवासी भी आते हैं। इसी दिन मेवाड़ के आराध्य भगवान एकलिंगनाथ के मंदिर में भी फागोत्सव होता है।

मेवाड़ में फागोत्सव की धूम इसी दिन विराम पाती है। राजसमंद के चारभुजा मंदिर में 15 दिन के फागोत्सव के लिए हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। श्रद्धा ठाकुरजी के साथ फाग खेलने की है, जिसके लिए मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र

रंग तेरस : चारभुजा मंदिर में 15 दिन फागोत्सव

मेवाड़ का अनूठा फागोत्सव : ढूंढोत्सव में बेटा-बेटी की समानता का संदेश, अंचल की परंपराओं में हैं रोचक-रोमांचक मुकाबले और हैरतअंगेज खेल भी**

सप्तमी-अष्टमी : आरोग्य के लिए शीतला पूजन

इन दो दिन महिलाएं परिवार के आरोग्य की कामना से मां शीतला का पूजन करती हैं। सप्तमी पूजन पर छठ और अष्टमी पूजन पर सप्तमी के दिन बास्योड़ा के लिए तरह-तरह के व्यंजन बनेंगे। पूजन वाले दिन भोजन या कुछ भी गरम खाया-पीया नहीं जाता। मान्यता है कि मां शीतला स्वास्थ्य दायिनी हैं।

आदिवासी बहुल खेरवाड़ा के भाणदा कस्बे में यह दौड़ दिलचस्प होती है। उत्साह इतना कि दूसरे शहरों, राज्यों में रोजगार के लिए बसे लोग भी घर लौटते हैं। बड़े और वजनी ढोल लिए युवक चौराहे के ठाकुरजी मंदिर से दौड़ शुरू करते हैं। लक्ष्य होता है एक किलाेमीटर दूर भैरव तालाब, जहां दौड़ पूरी होती है।


रंग पंचमी : भाणदा में ढोल लेकर दौड़ते हैं प्रतिभागी
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