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मैं वह सीता नहीं हूं, जिसने पतिव्रता साबित करने अग्नि परीक्षा दी थी

एक वर्ष पहले
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-डॉ. अलकनंदा शर्मा

मैं वह सीता नहीं हूं, जिसने राजधर्म की खातिर वनवास का भोग किया।

मैं वह सीता नहीं हूं, जिसे संतान को पिता का नाम देने के लिए पृथ्वी में समाना पड़ा।

मैं वो अनुसूया हूं, जिसने त्रिदेवों को शिशु बनाकर पालने में सुलाया था।

मैं वह मैत्रेयी हूं, जिससे पति से आत्मज्ञान की शिक्षा ली।

मैं वह भारती हूं, जिसने शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में हराया था।

यहां नारी के अबला व सबला की बात नहीं है

यहां नारी की तुलना पुरुष से करने की बात नहीं है।

नारी हमेशा नारी ही रहेगी।

उसके ममत्व, उसके साहस, उसके धैर्य, उसके ज्ञान, उसके प्रेम का कोई सानी नहीं है।

जहां जीजाबाई की शिक्षा से बेटा शिवाजी छत्रपति बन सकता है।

जहां रेणुका का बेटा परशुराम मां को जीवित करा सकता है।

जहां लक्ष्मी बाई जैसी नारी राज्य धर्म के लिए लड़ सकती है।

जहां पन्ना धाय मां देशभक्ति के खातिर बेटे की कुर्बानी दे सकती है।

हां... मुझे नहीं देनी सीता जैसी अग्नि परीक्षा।

हां... मुझे नहीं करना रानी पद्मिनी जैसा जोहर।

हां.. मैं ‘मैं’ हूं, मेरे जैसा कोई नहीं।

मैं आज की नारी हूं, शिक्षित-स्त्रीधर्म से पूर्ण हूं।

परिपूर्ण हूं, खुश हूं, आनंदित हूं।

सिर्फ मैं मैं हूं।
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