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आदिवासी समाज में महिलाओं को वर चुनने-बदलने की आजादी, ना घूंघट, ना दहेज, हाथ चूमकर करतीं अभिवादन, लिंगानुपात भी बेहतर

3 वर्ष पहले
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समाज में पिछड़ेपन के तमगे के साथ जी रहा आदिवासी समाज और उनकी मान्यताएं आज के वर्तमान दौर में सुशिक्षित और अगड़े समाज से कहीं ज्यादा खुली और प्रेरणादायी हैं। एक ओर जहां देश और समाज में महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं इन सबसे पिछड़े इलाकों में महिलाओं को सिर्फ बराबरी का दर्जा ही नहीं, पुरुषों के मुकाबले कहीं अधिक आजादी है। भास्कर ने जब उदयपुर जिले के कई गांवों में जाकर वहां की अदिवासी महिलाओं के हालातों को जाना तो पाया कि यहां की महिलाएं असुविधाएं जरूर झेलती हैं लेकिन समाज की कुंठित सोच, पुरुष प्रधान मानसिकता, सामाजिक बंदिशें और महिलाओं पर लगाई जाने वाली कई पाबंदियों की समस्याओं से ये आजाद हैं। इन आदिवासी इलाकों में महिलाओं पर ना ही समाज का कोई बोझ है और ना ही परिवार की बंदिशें। भास्कर टीम ने आदिवासी इलाकों के 20 गांवों में जाकर उनकी परंपराएं और रहन सहन को देखा तो ऐसे कई चौंकाने वाली चीजें दिखीं। आईआईएम उदयपुर के छात्रों और रिसर्च स्कॉलर्स की टीमें भी आदिवासी इलाकों में जाकर इस तरह के अनुभव को प्रामाणिक कर चुकी हैं।

कामकाज और संपत्ति में बराबर भागीदारी सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप: प्रो. सुधा चौधरी
सुविवि के दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष और आदिवासियों पर लम्बे समय से काम कर रहीं प्रो. सुधा चौधरी बताती हैं कि आधुनिकता से दूर और मुख्यधारा से कटा है आदिवासी समाज लेकिन सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप, कामकाज में भागीदारी और सम्पत्ति में भी बराबर का योगदान होने के चलते पुरुषों के मुकाबले बराबर की आजादी अौर सम्मान इन इलाकों में महिलाओं को मिलता है। ऐसी कई आजादियां ये समाज महिलाओं को देता है जो आधुनिक और शहरी समाज अपनी महिलाओं को नहीं देता।

एक-दूसरे का हाथ चूमकर अभिवादन करतीं आदिवासी महिलाएं।

गांव में बगैर घूंघट के रहती हैं महिलाएं।

बहुु-बेटियां बिना घूंघट के ही सहज रहती हैं
आमतौर पर शहरों, कस्बों और सम्पन्न परिवारों में आज भी महिलाओं को अपने घर और समाज के बुजुर्ग लोगों के सामने घूंघट लगाना पड़ता है, लेकिन आदिवासियों में घूंघट जैसी कोई परंपरा नहीं है। घर की बहु हो या बेटियां वे सहजता से अपने परिवार और गांव में बिना घूंघट के रह सकती हैं।

विवाह का दबाव नहीं वर चयन की आजादी
आदिवासी इलाकों में विवाह के मामलों में महिलाओं को पूर्ण आजादी है। शादी के दौरान लड़के का पिता लड़की के पिता को पैसा देता है। महिलाओं को अपना वर चुनने की आजादी होती है। नाता प्रथा के तहत पति से परेशानियां आने पर कुछ पैसा देकर महिला किसी अन्य पुरुष के साथ जीवन बिता सकती है।

कोई भेदभाव नहीं, महिलाओं को लेकर पूर्ण खुलापन है

महिला-पुरुषों में कोई भेदभाव नहीं है। बराबरी इस कदर है कि जिस तरह महिलाओं के सामने पुरुष बिना किसी हिचक के स्नान करते हैं। उसी तरह इन इलाकों में महिलाएं भी पुरुषों के सामने स्नान करती हैं। महिलाओं का पूरा सम्मान होता है।

कपड़े पारंपरिक भी और आधुनिक भी
घर की बहुओं या बेटियों को कपड़े पहनने को लेकर कोई पाबंदी नहीं है। अपनी पारम्परिक पोशाक में महिलाएं इन इलाकों में रहती हैं। कोई निश्चित पोशाक पहनने की बाध्यता नहीं है। साड़ियों में भी रहती हैं तो आधुनिक परिधानों में भी इन इलाकों की महिलाएं दिख जाएंगी।

दो दिन बाद मिले तो हाथ चूमकर अभिवादन
शहरों में लड़का-लड़की एक-दूसरे का हाथ चूमकर प्रेम का प्रस्ताव देते हैं, उसी तरह यहां भी करते दिखे। शहरों में किसी के निधन पर लोग रोते हैं लेकिन यहां निधन पर महिलाएं शोक मनाने के बजाय एक दूसरे का हाथ चूमकर सांत्वना देती हैं। दो-तीन दिन बाद मिलने पर भी ये हाथ चूमकर अभिवादन करती हैं।

हाथ चूमकर स्वागत करतीं।

सबसे अच्छा लिंगानुपात, लड़कियां ज्यादा
लिंगानुपात में आदिवासी समाज अन्य वर्गों की तुलना में बहुत आगे और बेहतर है। इन इलाकों में लड़कियां लड़कों के मुकाबले ज्यादा पैदा होती हैं और सुरक्षित भी रहती हैं। इनका लिंगानुपात शहरी क्षेत्रों से ज्यादा है। इसके अतिरिक्त भ्रूण हत्या जैसे मामलों भी इन आदिवासी इलाकों में देखने को नहीं मिलते हैं।

जिले की 11 तहसीलों में आदिवासी तहसीलें बेहतर
उदयपुर जिले में 11 तहसीलें हैं, इनमें शहरी इलाकों और सामान्य वर्ग बाहुल्य इलाके वाली गिर्वा, मावली और वल्लभनगर तहसीलों का लिंगानुपात और शिशु लिंगानुपात सबसे कम है। जबकि पूरी तरह आदिवासी बाहुल्य इलाके वाली कोटड़ा, झाड़ोल और लसाड़िया तहसीलों का लिंगानुपात बेहतर है।

लिंगानुपात के मामले में 1000 लड़कों पर झाड़ोल 977 लड़कियों के साथ पहले, कोटड़ा 974 के साथ दूसरे और सलूम्बर 971 के साथ तीसरे स्थान पर है। वल्लभनगर 957 के साथ 10वें और गिर्वा 941 के साथ अंतिम 11वें स्थान पर है।

ये आंकड़े जाे बताते हैं आदिवासी कितने आगे
नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे 2016 के अनुसार उदयपुर जिला राजस्थान में सबसे अागे है। 1000 लड़कों के मुकाबले 1043 लड़कियां हैं। प्रदेश का लिंगानुपात 1000 लड़कों के मुकाबले 973 लड़कियां है।

पिछले 5 वर्ष में पैदा हुए बच्चों में प्रदेश में सबसे ज्यादा उदयपुर जिले में 1000 लड़कों पर 993 लड़कियां हैं।

इसी तरह शिशु लिंगानुपात में 1000 लड़कों पर कोटड़ा तहसील 967 लड़कियों के साथ सबसे आगे है, झाड़ोल 958 के साथ दूसरे और लसाड़िया 957 के साथ तीसरे स्थान पर है। वल्लभनगर 903 के अनुपात के साथ 9वें, गिर्वा 902 के साथ 10वें और मावली 901 के साथ अंतिम पर है।

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