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पढ़ाई की उम्र में हुई थी शादी, अपने लिए लड़ींअब महिलाअाें की अगली पीढ़ी के लिए लड़ रहीं

एक वर्ष पहले
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वे पढ़ना चाहती थीं, मगर नन्ही उम्र में शादी के बंधन में बांध दी गईं। नए रिश्ते के साथ जिम्मेदारियां, बंदिशें और चुनौतियां भी बढ़ती चली गईं। लेकिन हिम्मत नहीं हारीं। घर-परिवार के जिम्मे तो बखूबी निभाए ही, इन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में खुद काे एक महिला के ताैर पर मजबूती से स्थापित किया। इस महिला दिवस पर भास्कर रूबरू करा रहा है एेसी ही महिलाअाें से, जिन्हाेंने न सिर्फ अपनी लड़ाई लड़कर खुद काे मजबूत बनाया, बल्कि दूसरी महिलाओं के हक की पैरवी करते हुए समाज काे भी नई दिशा दे रही हैं।

मुश्किलें और बंदिशें बढ़ती रहीं, पर नहीं छोड़ी किताबों-पढ़ाई से दोस्ती

11वीं कक्षा में शादी हुई थी। तब साइंस बायाेलाॅजी पढ़ रही थी। डाॅक्टर बनना चाहती थी, मगर शादी हाे गई। फिर प्राइवेट आर्ट्स में पढ़ाई की। सेकंड ईयर में बेटी अाैर थर्ड ईयर में बेटा हुअा। एमए में प्राइवेट पढ़कर सुविवि से गाेल्ड मेडल हासिल किया। एमफिल किया ताे पहली पाॅजिशन बनी। उसके बाद पीएचडी की। 1992 में जाॅब में अाई। मीरा गर्ल्स काॅलेज में उर्दू पढ़ाती थी। हाल ही में रिटायर हुई डॉ. सरवत ने महिला उत्पीड़न अाैर शिक्षा पर बहुत काम किया है। शादी के बाद पढ़ाई करना बेहद मुश्किल था। मगर घर पर रहकर पूरी मेहनत से पढ़ा। 15 साल राष्ट्रीय सेवा योजना में रही ताे वास्तविक समस्याएं जानी अाैर उस पर लिखना शुरू किया। शिक्षा, स्वास्थ्य समेत महिलाओं से जुड़े हर मुद्दे की वे पैरोकार हैं और बुलंदी से आवाजी उठाती हैं।

अभिभावकों-शिक्षकों को दिखातीहैं राह, बच्चों के लिए चला रही कैंपेन

11वीं कक्षा में थी कि शादी हो गई। बीकाॅम सेकंड ईयर में आई और बेटे, फिर एमकाॅम फाइनल ईयर में आने तक बेटी का जन्म से जिम्मे बढ़ते ही रहे। पढ़ाई नहीं छोड़ी। बीएड अाैर एमबीए के बाद पीएचडी अाैर फिर अाईअाईएम अहमदाबाद से फैकल्टी डवलपमेंट प्राेग्राम अाैर हावर्ड से मैनेजमेंट टीचर्स का काेर्स किया। जहां शादी हुई, वहां 11 भाई-बहनों का बड़ा परिवार था। चाैथी लड़की हाेने के कारण भावनात्मक रूप से इतनी तवज्जो नहीं मिल पाई थी। 1973 में अाई बाढ़ में सबकुछ बह गया था। बचपन में संघर्ष के साथ ही जिंदगी की शुरुआत हुई। गरीबी झेली, समाज का रिजेक्शन भी देखा। राशन की दुकानाें पर बड़ी कतारें देखी। इन हालात ने एक अाग काे जिंदा रखा कि कुछ बनने से ही हाेगा। अावाज ऊंची रखाेगे ताे ही समाज सुनेगा। शादी के बाद मेजर गायनिक प्राॅब्लम अाैर गिलबर्ट सिंड्राेम हाे गया।

डायन प्रताड़ना के खिलाफ खोला मोर्चा, नरेगा में महिलाओं की पैरवी

नौवीं कक्षा में थी कि शादी कर दी गई। प्राइवेट पढ़कर बीए किया। ग्रेजुएशन सेकंड ईयर में थी कि बेटा हुअा। एमए प्रीवियस में आते-आते बेटी का जन्म हुआ। फिर पीएचडी और जेअारएफ किया। 1994 में अारपीएससी में चयन के बाद 2012 में सुविवि में प्राेफेसर बनी। जाे भी शिक्षा हुई, जनता से हुई। किसान घर से थी। गांव में जाे बच्ची पलती है, आम धारणा थी कि शादी हाे जाए अाैर जिम्मेदारियां निभाए। पढ़ाई में पति शंकरलाल चौधरी ने कदम-कदम पर साथ दिया। बांसवाड़ा अाई ताे एक साथी ने राहुल सांकृत्यायन की किताब भागाे मत, दुनिया काे बदलाे दी। यही जिंदगी का टर्निंग पाॅइंट था। जनता के साथ जीना अाैर उसी के साथ मरना अच्छा लगने लगा। लड़कियाें की कई याेग्यताएं-क्षमताएं दबा दी जाती हैं। लाेगाें की साेच है कि महिला हर चीज के लिए जिम्मेदार है। जब तक अाप व्यवस्थागत लड़ाई नहीं लड़ते, तब तक वही सही लगाता है।


डाॅ. सरवत खान, एमजी कॉलेज में उर्दू विभाग की पूर्व अध्यक्ष और लेखक**

प्राे. राजेश्वरी नरेंद्रन, सुविवि में व्यवसाय प्रबंधन विभाग अध्यक्ष व पूर्व निदेशक एकेडमी ऑफ एचआरडी**

परेशानियों को ही बना लिया ताकत**

प्राे. सुधा चाैधरी, सुविवि में दर्शन शास्त्र विभाग अध्यक्ष और एपवा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष**

यह है शख्सियत

सरकार से बेस्ट प्राेग्राम अाॅफिसर का पहला पुरस्कार 2002 में मिला। नाेवेल, अफसाने अाैर समीक्षा लिखती हैं। कहती हैं, टीवी सीरियल बालिका वधू उन्हीं के लिखे नाेवल पर अाधारित था। उनका सीरियल मुट्‌ठी में चांद भी काफी सराहा गया। किताब लिखी- मीरा शख्सियत अाैर फन। हर साल दो महीने मुफ्त में उर्दू पढ़ाती हैं। इनमें मुस्लिम से ज्यादा दूसरे समुदायों के छात्र हैं। सन 2016 में बिहार उर्दू अकादमी से अंधेरा पग के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

कामयाबी की कहानी

देश में 311 पेरेंटिंग वर्कशाॅप, 300 वर्कशाप टीचर्स के लिए कर चुकीं। बच्चाें के लिए मेक ए डिफरेंस कैंपेन 29 साल से चला रही हैं। वर्ल्ड एचअारडी कांग्रेस ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट, सुपर वुमन अवार्ड दिया। वुमन इकाेनाेमिक फाेरम ग्लाेबल अवार्ड, समर्पण अवार्ड भी पाया। आने वाले दिनों इंटरनेशनल लर्नर साेसायटी में वुमन अाॅफ सब्सटेंस का पुरस्कार भी पाने वाली हैं।

महिलाओं के लिए संघर्ष

प्रो. सुधा दक्षिण राजस्थान में डायन की घटनाअाें के खिलाफ लड़ीं। लोगों को बताया कि डायन सामाजिक अपराधाें का ही नाम है। नरेगा में महिलाअाें पूरा पारिश्रमिक दिलवाने के लिए अांदाेलन चलाया। एकल महिलाअाें काे पेंशन के लिए काम किया। अादिवासी अाैर पिछड़े इलाकाें में महिलाअाें को न्याय दिलवाने के लिए लड़ीं।
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