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मीरा बाई : श्रीकृष्ण से ऐसी लगी थी लगन ‘न भूतो-न भविष्यति’

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 06:41 AM IST

Udaipur News - कागा सब तन खाइयो, चुण-चुण खाइयो मास, दो नैणां मत खाइयो, मोहे पिया मिलन री आस...।। प्रेम के प्रति अप्रतिम समर्पण का...

Udaipur News - rajasthan news meera bai srikrishna has liked such kind of passion 39do not forget no future39
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कागा सब तन खाइयो, चुण-चुण खाइयो मास, दो नैणां मत खाइयो, मोहे पिया मिलन री आस...।। प्रेम के प्रति अप्रतिम समर्पण का अहसास जगाती ये पंक्तियां मीराबाई के भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और प्रेम का अहसास करवाती हैं। मेवाड़ की मीरा के अलावा संसार में ऐसा कहीं कोई उदाहरण नहीं है कि जिससे आप प्रेम करें, उसी में समा जाएं...। बचपन में मिली भगवान कृष्ण की मूर्ति को जीवनभर पति मानना और उसी पर अपनी आत्मा और शरीर को न्यौछावर करने का अनुपम उदाहरण मीरा के प्रेम में ही मिलता है। मेरो तो गिरधर गोपाल, दूजो ना कोय... गाने वाली मीरा के लिए कृष्ण ही प्रेमी, कृष्ण ही पति और कृष्ण ही ईश्वर थे। मीरा के इन शब्दों में संसार में उनके लिए कृष्ण के अलावा कोई पुरुष नहीं रहा। मीरा को प्रेम दीवानी से ज्यादा दर्द दीवानी कहा जाता है। कृष्ण के प्रति प्रेम भी इतना कि कुछ समय में पति की मौत के बाद संसार के ताने, राज परिवार के मौत से सामना करवाने वाले कष्ट भी उन्हें कृष्ण की भक्ति से डिगा नहीं पाए।

चित्तौड़ स्थित मीरा मंदिर

मीरा का जीवन : एक नजर में

जन्म : मेड़ता में राव दूदा के घर 1498। पिता : राव रतनसिंह, पति : महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज। किवदंती : द्वारिकाधीश की प्रतिमा में समाना : संवत् 1546 में।

प्रताप : मातृभूमि के प्रति समर्पण और प्रेम का अकबर भी था कायल

मातृभूमि से ऐसा प्रेम कि महलों का राजसी ठाठ-बाट छोड़कर जंगल-जंगल भटकते रहे थे महाराणा प्रताप। निपुण तथा छोटी सेना को साथ में लेकर अकबर को लोहा मनवाते रहे। मातृभूति से प्रेम के कारण अंत तक हार नहीं मानी और संकट से जूझते हुए 57 साल की उम्र में निधन हो गया। कहा जाता है कि प्रताप के मातृभूमि के प्रति प्रेम, समर्पण-त्याग का अकबर भी कायल था। प्रताप के निधन का समाचार सुनकर अकबर की भी आंखें भर आना बताया जाता है।

प्रताप का हाथी रामप्रसाद

प्रताप के हाथी रामप्रसाद का भी अपने स्वामी के प्रति लगाव रहा। इतिहासकार बताते हैं कि अकबर उसे बंदी बनाकर दिल्ली ले गया। जहां रामप्रसाद ने भी अकबर की गुलामी स्वीकार करने के बजाय कई दिनों तक खाना-पीना त्यागकर अपनी जान दे दी थी।

स्वामी के प्रति प्रेम का उदाहरण चेतक घोड़ा

स्वामी के प्रति प्रेम तथा समर्पण की मिसाल प्रताप के घोड़े चेतक से बढ़कर किसी में नहीं दिखी। चेतक ने हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के जीवन पर संकट आया देख अपने प्राणों को संकट में डाल दिया। युद्ध के दौरान पैर में तलवार का वार लगने के बाद भी घायल चेतक ने न केवल प्रताप को युद्ध क्षेत्र से दूर पहुंचाया, बल्कि पीछा करते शत्रु के सैनिकों से बचाने के लिए 26 फीट का नाला भी एक छलांग में पार कर लिया था।

महाराणा प्रताप का जीवन

जन्म : 9 मई 1540 कुंभलगढ़ में

निधन : 19 जनवरी 1597 चावंड उदयपुर

पिता-माता : उदयसिंह द्वितीय, जयवंताबाई

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