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लाेक कला मंडल के संग्रहालय में संरक्षित हैं देश की विभिन्न शैलियों के 40 से ज्यादा मुखौटे

Udaipur News - समय के साथ नाटक अाैर नृत्य में इस्तेमाल हाेने वाले मुखौटे अाज कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन लोक कलाओं के...

Dec 07, 2019, 12:50 PM IST
Udaipur News - rajasthan news more than 40 masks of different styles of the country are preserved in the museum of lak kala mandal
समय के साथ नाटक अाैर नृत्य में इस्तेमाल हाेने वाले मुखौटे अाज कहीं भी दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन लोक कलाओं के संरक्षण, विकास, उत्थान, एवं प्रचार प्रसार करने वाले भारतीय लाेक कला मंडल के संग्रहालय में प्रदेश समेत देशभर की जनजाति द्वारा बनाए जाने वाले मुखाैटाें का संग्रहण है। मंडल के निदेशक लईक हुसैन ने मुखौटों की जानकारी दी। उन्होंने बताया विभिन्न शैलियों अाैर चेहरे की अभिव्यक्ति के लिए मुखौटे पहने जाते थे। वर्तमान मेंं इन्हें बनाने वालाें की संख्या घटी है अाैर पहनने वालाें की भी। देशभर में नाटक अाैर नृत्य के लिए बनने वाले मुखौटे शैलियों के बदलने के साथ चेहरे के अनुरूप या उससे बड़े बनाए गए। परंपरा से जुड़े ये मुखौटे स्थानीय कच्ची सामग्री के प्रयोग तथा स्थानीय संस्कृति के प्रभाव के कारण भारतीयों के अलावा विदेशी पर्यटकों को भी बहुत आकर्षित करते हैं। पुराने समय में रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं को नाट्य रूप में परिवर्तित किया गया। इसके बाद प्रदर्शन के लिए विभिन्न पात्रों के लिए मुखौटों का विकास हुअा।

छाऊ नृत्य के मुखाैटे

छाऊ नृत्य मूल रूप से बंगाल के मुंडा, महतो, कलिन्दि, पत्तानिक, समल, दरोगा, मोहन्ती, भोल, अचर्या, कर, दुबे और साहू सम्प्रदाय के लोग करते हैं। इसमें इस्तेमाल हाेने वाले मुखौटे मुख्य रूप से पेपरमेशी से बनाए जाते हैं। छाऊ नृत्य में पुरुलिया अाैर सराईकला दाे शैलियां हैं। पुरुलिआ छाऊ बंगाल के पुरुलिआ जिले में किया जाता है। इनमें इस्तेमाल हाेने वाले मुखौटे सांसारिक, चिन्तन अाैर हिन्दू पुराण के चरित्र काे दर्शाते हैं।

बंगाल का मुखाैटा

गवरी के मुखौटे : गवरी नृत्य में इस्तेमाल हाेने वाले मुखाैटे मुख्य रूप से लकड़ी के बनाए जाते हैं। गवरी में मात्र भील पुरुष पात्र होते हैं। महिला का किरदार भी पुरुष ही करते हैं। इसमें गणपति, काना गुजरी, जोगी, लाखा बंजारा अादि के खेल प्रमुख होते हैं। भस्मासुर के रूप में गवरी का नायक राई, बुढ़िया अपने मुंह पर मुखौटा धारण कर गवरी का संचालन करते हैं। इसके अलावा केरला का थेरूकुट्टू, तमिलनाडु का थय्यम, महाराष्ट्र का भवांडा समेत कई नृत्यों की शैलियों में भी मुखाैटाें का इस्तेमाल हुअा है।

पुरूलिया शैली

संग्रहालय में 40 साल पुराना मुखौटा भी है

लोक कला मंडल के संग्रहालय में महाराष्ट्र, बंगाल, हिमाचल, मणिपुर, राजस्थान आदि राज्यों के विभिन्न शैलियों के 40 से अधिक मुखौटे संग्रहित हैं। इनमें 40 साल पुराना मुखौटा भी शामिल है, जो पुरुलिया का है।

बंगाल का मुखाैटा

मयूर भंज शैली

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