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विरासतों के शहर उदयपुर के संग्रहालय बांचते हैं सभ्यता, कला और सांस्कृतिक विकास की गाथा

Udaipur News - वैभवशाली इतिहास संजोए झीलों का शहर संग्रहालयों की नगरी भी है। ऐतिहासिक विरासतों काे संजोए रखने के लिए समय-समय पर...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 10:41 AM IST
Udaipur News - rajasthan news museums of the city of heritage run in udaipur saga of civilization art and cultural development
वैभवशाली इतिहास संजोए झीलों का शहर संग्रहालयों की नगरी भी है। ऐतिहासिक विरासतों काे संजोए रखने के लिए समय-समय पर महाराणाओं, शिक्षाविदों, कलाकारों और संस्थाओं के बनाए संग्रहालय दशकों से नई पीढ़ी और शाेध छात्रों की पाठशाला बने हुए हैं। आज भी ऐसे एक दर्जन से ज्यादा ऐसे केंद्र हैं, जिनमें विभिन्न शैलियों की पेंटिंग, एंटीक ज्वैलरी, दुर्लभ फाेटो, सभ्यता को दर्शाते पुराने बर्तन-हथियार, स्कल्पचर, पांडुलिपियां हैं। विश्व संग्रहालय दिवस शनिवार को है। इस मौके पर भास्कर आपको रूबरू करा रहा है शहर के उन प्रमुख संग्रहालयों से जो दशकों से न सिर्फ सभ्यता और शहर के कला-संस्कृति से वाकिफ करवा रहे हैं, बल्कि पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र हैं।

शिल्पग्राम म्यूजियम शिल्प-कलाओं का संसार

70 एकड़ में फैला ग्रामीण कला और शिल्प परिसर एक जीवित संग्रहालय है। शिल्पग्राम के अंदर गोल संग्रहालय, माटी के रंग, टीआरई का संग्रहालय है। माटी के रंग में टेराकोटा से निर्मित कलाकृति प्रदर्शित की गई है। टीआरई म्यूजियम में पुराने तांबे और मिटटी के बर्तन, जनजातियों से जुड़ीं पुरानी वस्तुएं संग्रहित हैं

साहित्य संस्थान : यहां हैं 6 हजार से ज्यादा पांडुलिपियां, 5000 पुरानी सभ्यता के पुरावशेष

हल्दीघाटी म्यूजियम : इतिहास का झरोखा

खमनोर में चेतक स्मारक के पास हल्दीघाटी म्यूजियम का निर्माण मोहनलाल श्रीमाली ने करवाया, जिसका उद्घाटन 19 जनवरी, 2003 को तत्कालीन राज्यपाल अंशुमान सिंह ने किया। मेवाड़ राज्य चिह्न, पन्नाधाय का बलिदान, गुफा में महाराणा प्रताप की अपने मंत्रियों से गुप्त मंत्रणा, शेर से युद्ध करते हुए प्रताप, मानसिंह से युद्ध करते महाराणा प्रताप, महाराणा प्रताप एवं घायल चेतक घोड़े का मिलन, महाराणा प्रताप का वनवासी जीवन के साथ उनसे जुड़े अन्य प्रसंगों को यहां आकर्षक मॉडल के साथ झांकियों को प्रदर्शित किया गया है।

कामनेर से प्राप्त मटके

लोक कला मंडल म्यूजियम है लोककलाओं का संग्रह

यहां लोककलाओं और लोकनृत्य की विस्तृत जानकारी दी गई है। दिन में दो बार स्पेशल कठपुतली शो में रामायण, मुगल दरबार, संगठन मेंं बल, काबुलीवाला, स्वामी विवेकानंद, सांप-सपेरा, बहुरूपिया, तलवारों की लड़ाई, गेंदवाली, कच्छी-घोड़ी आदि की प्रस्तुति होती है।

विद्यापीठ के कुलपति प्रो. एस एस सारंगदेवोत ने बताया कि सन 1939 विद्यापीठ में राजस्थान हिन्दी साहित्य सम्मेलन हुअा। प्रबुद्धजनों ने एकस्वर में कहा कि राजस्थान के प्राचीन साहित्य के शाेध, खाेज अाैर प्रकाशन का संस्थान हाेना चाहिए। तभी जनार्दनराय नागर ने प्रस्ताव रखा और विद्यापीठ में 1941 में साहित्य संस्थान शुरू हुआ। इसके कार्यकर्ताओं ने गांव-ढाणियों, कस्बों-शहरों से पांडुलिपियों का भी संग्रह किया, जिनकी संख्या 6000 से भी अधिक हैं। ये 17वीं सदी से पुरानी हैं और इतिहास के मूल स्रोत के रूप में उपयोगी हैं। संस्थान में भारत के इतिहास को जानने के स्रोतों के रूप में पुरातात्विक सर्वेक्षण उत्खनन से प्राप्त सामग्री उपलब्ध है। पांच हजार साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता के तीनों चरणों के पुरावशेष अाैर सर्वेक्षण सामग्री इस संग्रहालय में है। इनमें मुख्य रूप से मिट्‌टी के बर्तनों को आकार-प्रकार, रंग, पकाने की प्रणाली व पात्रों के उपयोगिता के आधार पर विभाजित किया गया है। इसके अलावा बहुमूल्य पत्थरों (कारनेलियन, बेन्डेड, अगेट, चेल्सीडोनी, लेपीस लेजुली), स्टेटाइट, टेराकोटा मिट्टी, सोने व तांबे के मणके संगृहित हैं। महिलाओं के आभूषण में चूड़ी, कड़े, हार, शंख आदि मिट्टी से निर्मित हैं। अनाज के जले दानों के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। इसी सभ्यता के कालीन मेवाड़ के प्रथम कृषि पर आधारित प्रथम नगरीकरण एवं आहाड़ सभ्यता के प्रसिद्ध स्थल बालाथल, गिलुण्ड, धूलकोट आदि से उत्खनित सामग्री भी है। इसके अतिरिक्त बच्चों के खेलने के लिए बैलगाड़ी, चिप्पस, पासे, गेम्समैन आदि मिट्टी व पत्थर के बने हुए तथा हाथी दांत से बनी पतली चूड़ियां यहां देख सकते हैं। यही नहीं, 12वीं सदी वाली जावर माइन्स व अन्य खदानों की मूसें, भट्टी, धातुओं के प्रगलन की सामग्री, पूर्व मध्यकालीन स्थलों की ईंटें व टाइल्स, चन्द्रावती व चावंड से मिले मृदभाण्ड व अन्य पात्रों का संकलन है।

आहाड़ संग्रहालय : दर्शाता है सभ्यता का विकास

बागोर की हवेली में सब कुछ है एंटीक

पीछोला झील के किनारे बागोर की हवेली में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल बलिराम भगत ने 1 दिसम्बर 1997 को संग्रहालय का उद्घाटन किया। शस्त्रागार, रॉयल वेडिंग, कठपुतली, पगड़ी, महारानियों के एंटीक जेवर, वस्त्र का संग्रहालय है।

धूलकोट चौराहा स्थित आहाड़ संग्रहालय में चार हजार वर्ष पूर्व की सभ्यता के पुरावशेष हैं। यहां रखे लाल-काले मिट्‌टी के भांड, चमकीले लाल रंग के पात्र, कृषाण कालीन टोंटीदार लोटे, मृण मूर्तियां अादि आकर्षित करते हैं।

विटेेंज कार म्यूजियम में पुराने दौर की कारें

गुलाब बाग के सामने गार्डन होटल में पूर्व राजघराने की कारें आज भी रनिंग कंडीशन में हैं। रॉल्स रॉयस, 1939 कैडिलेक ओपन कन्वर्टिबल, मर्सिडीज के कई रेयर मॉडल, 1936 की वॉक्स हॉल और 1937 की कारों के ओपन मॉडल इस कलेक्शन को दूसरों से अलग करते हैं।

राजकीय संग्रहालय : राजस्थान के पुराने म्यूजियम में शुमार है यह

राजकीय संग्रहालय राजस्थान के सबसे प्राचीन संग्रहालयों में से एक है। इसे महाराणा शंभूसिंह के समय 1873 में स्थापित किया गया था, जबकि महाराणा सज्जन सिंह के काल में प्राचीन सामग्रियां संग्रहित की गईं। महाराणा फतहसिंह ने 1887 में महारानी विक्टोरिया की स्वर्ण जयंती पर सज्जन निवास बाग में नया भवन बनाया था, जिसका नाम विक्टोरिया हॉल संग्रहालय रखा। एक नवंबर 1890 को यह संग्रहालय दर्शकों के लिए खोला गया। 1968 में सज्जन निवास बाग से राजमहल परिसर में हिसाब दफ्तर कर्ण विलास में स्थानांतरित कर दिया। अभी यह राजकीय संग्रहालय, उदयपुर के नाम से जाना जाता है। इसमें पांच दीर्घाएं प्रमुख हैं, जिनमें मेवाड़ क्षेत्र के प्राचीन शिलालेख, प्रतिमाएं-लघुचित्र, प्राचीन सिक्के, अस्त्र-शस्त्र और टैक्सटाइल संग्रहित हैं।

सिटी पैलेस संग्रहालय

सिटी पैलेस म्यूजियम की स्थापना 1969 में महाराणा भगवत सिंह ने मेवाड़ की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए की थी। म्यूजियम का संचालन महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउंडेशन की ओर से किया जाता है।

सिटी पैलेस म्यूजियम में बच्चाें का प्रवेश निशुल्क

उदयपुर | विश्व संग्रहालय दिवस पर शनिवार को स्कूली बच्चों के लिए सिटी पैलेस म्यूजियम में प्रवेश निशुल्क रहेगा। बच्चों को स्कूल का पहचान पत्र लाना होगा। यहां फड़ प्रदर्शनी को विश्व संग्रहालय दिवस पर आईसीओएम की थीम के अनुरूप बनाने का प्रयास किया गया है।

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