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शौर्य ही नहीं, खान-पान भी है मेवाड़ की शान, चूरमा-बाटी, कढ़ी-राब और खड़ मसाला के देश-दुनिया में हैं मुरीद

Udaipur News - आप वाकिफ हैं कि कुछ दशक पहले तक इस अंचल के हर घर में रोज पकने वाली मक्का की राब आज हर शादी समारोह की शान है। यह भी...

Feb 15, 2020, 11:51 AM IST
Udaipur News - rajasthan news not only bravery food is also the pride of mewar churma baati kadhi raab and khad masala are murid in the country and the world

आप वाकिफ हैं कि कुछ दशक पहले तक इस अंचल के हर घर में रोज पकने वाली मक्का की राब आज हर शादी समारोह की शान है। यह भी जानते हैं कि चूरमा-बाटी हो या कढ़ी-गट्‌टे की खिचड़ी, ढोकले या खड़ (सिलबट्‌टे) पर पिसा लहसुन-लाल मिर्च का मसाला... ये सब हमारे हर छोटे-बड़े भोज और स्टार होटलों ही नहीं, दुनिया भर में पसंद किया जाता है। फिर यह जानना और भी दिलचस्प होगा कि मेवाड़ में मक्का और इससे बनने व्यंजनों का इतिहास यानी करीब तीन सदी (286 साल) का है। यहां सन 1734 में पहली बार मक्का उगाई गई थी। इससे रोटी के अलावा बने घाट-राब (दलिया), घेरिया, खिसिया (पापड़ी), ढोकले आज मेवाड़ की पहचान हैं। रोचक यह भी है कि शौर्य और प्रतापी इतिहास समेटे मेवाड़ खान-पान ही नहीं, बल्कि नूते (निमंत्रण) और मान-मनुहार में भी अव्वल है।

सुखाड़िया विवि : राजस्थान की खाद्य विरासत; मेवाड़ के संदर्भ में... राष्ट्रीय संगोष्ठी आज होगी


उदयपुर | सुविवि के इतिहास विभाग की ओर से फूड हैरिटेज ऑफ राजस्थान विद स्पेशल रेफरेंस ऑफ मेवाड़ विषयक राष्ट्रीय सेमिनार शनिवार को सुविवि गेस्ट हाउस में होगा। आयोजन सचिव डॉ. पीयूष भादवीया ने बताया कि सुबह नौ बजे उद्घाटन समारोह के मुख्य वक्ता इतिहासविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू और मुख्य अतिथि कुलप्रति प्रो. एन.एस. राठौड़ होंगे। महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउंडेशन और इनटेक के सहयोग से इस आयोजन में इनटेक उदयपुर के कन्वीनर डॉ. बी.पी. भटनागर और प्रो. अनिल कोठारी होंगे। अध्यक्षता आर्ट्स कॉलेज डीन प्रो. साधना कोठारी करेंगी। समापन समारोह शाम पांच बजे होगा। सेमिनार में राजस्थान और खासकर मेवाड़ की खाद्य विरासत पर विचार मंथन होगा।

बोकनिया के पत्तों और कमल जड़ ने बनाया मास्टर शेफ ऑफ राजस्थान


मेवाड़ी खान-पान कितना विचित्र और असाधारण है, इसकी बानगी पिछले साल मास्टर शेफ ऑफ राजस्थान में दिखी। प्रतिभागियों ने ढेरों तरह के व्यंजन बनाए थे। खिताब जीता उदयपुर की मानसी श्रीमाली, जिन्होंने थीम के अनुसार राजस्थान की लुप्त होती रेसिपीज पेश कीं। मानसी ने अलग-अलग राउंड में बोकनिया के पत्तों के पकोड़े, मावा-लोकी की भरवां बाटी, मेथी दाना कमल जड़ की सब्जी के अलावा पतोड़ (चक्की की सब्जी), बेजड़ रोटी, घेवर और फाइनल राउंड में काचरी पुदीना शरबत, पौष बड़े, अचारी मोठ की साग, पचमेला खिचड़ा, दुप्पड़ रोटी, बोकनिया का खाटा (कढ़ी) के अलावा डेजर्ट में सीताफल के गुलाब जामुन, गुड़ की लापसी जैसे व्यंजन बनाए थे। बोकनिया और चील की भाजी या बथुआ हमारे खेतों में खरपतवार की तरह उग आता है।

ट्रेंड : 90 फीसदी भोज में मेवाड़ी-राजस्थानी ढाबा, 36 तरह के व्यंजन


मेवाड़ खान-पान का क्रेज जबर्दस्त है। हलवाई कैटरर्स विकास समिति के संभाग अध्यक्ष हरीश भट्‌ट ने बताया कि शादियों के सीजन 90 फीसदी भोज में मेवाड़ी-राजस्थानी ढाबा की डिमांड रहती हैं। संभाग ही नहीं, पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश, गुजरात के अलावा महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में भी आयोजक खास तौर पर मेवाड़ी-मारवाड़ी स्टॉल पर जोर देते हैं। हालांकि इन आयोजनों में चाइनीस, इटालियन जैसे दूसरे काउंटर भी होते हैं, लेकिन मेहमानों का रुझान सबसे ज्यादा ट्रेडिशनल फूड पर ही दिखता है। कारण यह है कि वे इसे ही ज्यादा रियल मानते हैं। राजस्थानी ढाबा पर छह फ्लेवर के लड्‌डू, थेपला, गुलाब चूरमा, पांच तरह की बाटियां, गट्‌टे की सब्जी, कढ़ी, पंच रतन दाल, लहसुन का खड़ मसाला, गुड़, मक्का-भाकरी, हरे प्याज की सब्जी, मटर-मोगरी, बथुआ की भाजी को लेकर खासा चाव रहता है।


540 साल पहले एकलिंग महात्म्य ने बताई थी दर्जनों व्यंजनों की विधियां


1815 में शाही भोजों का हिस्सा बना अंग्रेजी पुलाव : डॉ. जुगनू के मुताबिक महाराणा भीम सिंह (1815) में मेवाड़ का अपना पाक शास्त्र ‘पाक संग्रह’ तैयार हुआ। इसमें शाकाहार-मांसाहार व्यंजन बनाने की विधियां थीं। यह वह दौर था, जब मेवाड़ में अंग्रेजी पुलाव शाही भोजों में शामिल हो चुका था। यही नहीं, मेवाड़ में आदिम भोज, लोक भोज और अभिजात्य भोज सदियों से है। यहां घरपति (मुखिया), हगरी (सपरिवार), नगरी (पूरा गांव या कस्बा) और 84 जिमाने की भी परंपरा रही है। नगरी और 84 के आयोजन धर्म-समाज के लोगों के लिए थे, जबकि बाल गोपाल न्योता परिवार सहित आने का तरीका।


इतिहास और लोक संस्कृति के विशेषज्ञ डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते हैं, मेवाड़ में पाक शास्त्र का सबसे पुराना प्रमाण सन 1480 का है। तब एकलिंग महात्म्य में भगवान एकलिंगनाथ के नैवेद्य और भोग सामग्री बनाने का विवरण लिखा गया। इनमें तड़ित (तली-छोंकदार), भर्जित यानी भूनी, रंधित (उबली हुई), वाष्पित यानी भाप में पकाई गई चार तरह की सब्जियां, पायस (खीर), संयाव (गेहूं के दलिये की खीर), लड्‌डू, खांड के मांडा (शक्कर से बने व्यंजन), अपूप (मालपुए), पोलिका (फुल्के), खाद्य (खाजे) समेत अनेक प्रकार के व्यंजनों का उल्लेख था। यह पहला अवसर था, जब श्रीखंड बनाने की विधि किसी पुराण ग्रंथ में लिखी गई। मेवाड़ के लोगों ने दुनिया भर तक यहां का स्वाद पहुंचाया है। इनमें मेनार सहित तीन दर्जन से ज्यादा गांवों के लोग हैं, जो आज अमेरिका, चीन और खाड़ी देशाें में बतौर शेफ काम कर रहे हैं। इन्होंने दाल-बाटी, चूरमा, मक्का की राब, खीच को दुनिया तक पहुंचाया और दुनिया के देशों ने उन पर कई प्रयोग किए हैं।

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