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स्थानीय नेताओं के कामकाज से खुश नहीं आलाकमान, भाजपा बदलेगी जिलाध्यक्ष

भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के पद से अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद पार्टी में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 20, 2018, 05:50 AM IST

भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर

भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के पद से अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद पार्टी में संगठनात्मक बदलाव का काम शुरू हो चुका है। भाजपा जल्द ही 21 जिलाध्यक्ष बदलने जा रही है। इसमें श्रीगंगानगर का नाम भी शामिल है। जिला टीम व प्रदेशकार्यसमिति में फेरबदल लगभग तय है। सबसे बड़ी वजह ये सामने आई है कि प्रदेश संगठन महामंत्री चंद्रशेखर खुद ही इन नेताओं के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। खराब आउटपुट के बारे में आलाकमान को फीडबैक भी दिया जा चुका है। श्रीगंगानगर जिले के प्रभारी अल्पसंख्यक आयोग अध्यक्ष जसबीरसिंह व पार्टी जिलाध्यक्ष हरीसिंह कामरा मंडल स्तर पर नियुक्तियां तक नहीं कर सके हैं।

राजनीतिक सूत्रों के मुताबिक भाजपा अबकी बार जिले में ओबीसी कार्ड खेल सकती है। अंदरूनी तौर पर जाति को भी आधार बना अहम पदों पर नियुक्तियां की जा सकती हैं। चुनाव जीतकर आने वाले की बजाय संगठन में लंबे समय से काम करने वालों की अहमियत रहने की संभावना है। जिलाध्यक्षी के लिए पार्टी के कई स्थानीय नेता कैबिनेट मंत्री डॉ. रामप्रताप, सांसद निहालचंद व भाजपा विधायकों के करीबी होने का फायदा उठाना चाहते हैं। जिलाध्यक्ष कामरा जिलामुख्यालय पर कम समय ही बता पाते हैं। वे मूलरूप से श्रीविजयनगर के रहने वाले हैं। जिलाध्यक्ष की दौड़ में पूर्व मंत्री व पूर्व विधायकों के करीबी भी शामिल हैं।

फेरबदल की वजहें

1. सीएम दौरे से ठीक पहले 216 बूथ अध्यक्ष लगाए|बीते दिनों सीएम ने दौरा किया, जिसमें उन्होंने पहले ही बता दिया था कि उनका फोकस बूथ अध्यक्षों पर है। इस स्थिति में सीएम के दौरे से ठीक पहले 216 बूथ अध्यक्षों का मनोनयन किया गया। मंडल स्तर पर नियुक्तियां ही नहीं कर पाना पहली कमी है।

2. तेज तर्रार वक्ता चाहिए, स्थानीय नेता शांत|ये बात सही है कि जिलाध्यक्ष हरीसिंह कामरा व प्रभारी जसबीरसिंह शांत स्वभाव नेता हैं, लेकिन पार्टी स्तर पर इसे भी कमजोरी के रूप में आंका जा रहा है। कारण- पार्टी तेजतर्रार वक्ता की उम्मीद रखती है, ताकि कार्यकर्ताओं में उत्साह रहे।

3. दोनों नेताओं की दूरी|हरीसिंह कामरा श्रीविजयनगर व जसबीरसिंह ज्यादातर जयपुर रहते हैं। ऐसे में सिर्फ मीटिंग की औपचारिकता ही हो पाती है। सियासी गलियारों में ये हलचल भी है कि जिलाध्यक्ष के कार्यकाल में पार्टी दफ्तर में 78 कुर्सियां रहीं, जिनकी संख्या बढ़ नहीं सकी। इस स्थिति में फेरबदल के संकेत हैं।

मंडल स्तर पर नियुक्तियां तक नहीं कर पाए स्थानीय नेता

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