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खेतड़ी रियासत में पटेल उपाधि मिली, तब से होली दहन कर रहा है कोटपूतली का पटेल परिवार
यह क़िस्सा आज से लगभग 150 वर्ष पहले 19वीं सदी का है जब कोटपूतली खेतड़ी रियासत का अंग हुआ करता था। इस क्षेत्र को तंवरावाटी या तौरावाटी भी कहा जाता है। खेतड़ी रियासत सीमित संसाधनों, राजस्व व कम सैनिक शक्ति वाली रियासत थी। आजादी से पहले जयपुर व पटियाला के महाराजाओं को लगान भी भरती आई है। एक बार मराठों का शासन भी खेतड़ी पर रह चुका है। वजह थी खेतड़ी रियासत को लेकर जयपुर व पटियाला के महाराजाओं के बीच युद्ध, जिसमें हार या जीत होने पर ये महाराजा खेतड़ी को एक- दूसरे को सौंप दिया करते थे।
एक बार तो जयपुर के महाराजा ने खेतड़ी रियासत को मराठों से युद्ध में हारने पर मराठों को भी युद्ध की सन्धि राशि वसूलने के लिए सौंप दिया था। ऐसे में पहले से ही राजस्व की कमी से जूझ रही रियासत को भारी करों का सामना करना पड़ा। रियासत को भारी कर की अदायगी लगान के रूप में कोटपूतली परिक्षेत्र के 120 गांव से होती थी। इसके लिए 120 गांवों से लगान की वसूली के लिए 4 ठिकानों का निर्माण यहां किया गया था। दरअसल तब कोटपूतली शब्द अस्तित्व में भी नहीं आया था। कोटपूतली के राजपूत ठिकानेदार 19वीं की सदी के अंत तक खेतड़ी रियासत को लगान चुकाने में असक्षम हो गए थे।
ऐसे में 120 गांवों के ठिकानेदारों पर राजस्व वसूली की निगरानी के लिए दरबार की और से परगना पटेल का पद सृजित किया गया। इसकी जिम्मेदारी कांवर गौत्र के बड़े गुर्जर जमींदार मोती लाल के सुपुर्द करते हुए न्यायिक शक्तियां भी निहित की गई। पटेल की पदवी दरबार की और से मिलने के बाद क्षेत्र की लगान वसूली व न्यायिक व्यवस्थाओं पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए मोती पटेल की और से यहां के बहादुर शाह गाजी के पास होली का दहन शुरू किया गया। तब ही से इस होली दहन में चौधरी की उपाधि वाले महाजन परिवार सम्मिलित होते रहे है।
पटेल के पद को 90 के दशक तक हीरालाल पटेल ने सुशोभित किया है। वर्तमान में भी पटेल परिवार लगभग डेढ़ सदी पुरानी इस गौरवशाली परंपरा का निर्वहन अपने पूर्वजों की तरह ही कर रहा है। सोमवार को भी होलिका दहन विधि-विधान से पटेल परिवार की और से युकां के पूर्व प्रदेश महासचिव भीम पटेल ने करवाई। बाबूलाल पटेल, दौलत पटेल, राज व अमन पटेल आदि उपस्थित थे।