अमरनाथ यात्रा / पुराणों ने इसे कहा है अमरेश तीर्थ, क्षणिक शिवलिंग और मुक्ति का धाम



Amarnath Yatra 2019 Importance of Amarnath yatra History and Mythology of Amarnath
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Amarnath Yatra 2019 Importance of Amarnath yatra History and Mythology of Amarnath

  • खराब मौसम के कारण 4 अगस्त तक रोकी गई अमरनाथ यात्रा 
  • लिंगपुराण से भृंगीष संहिता तक, अमरनाथ यात्रा और पूजा का पौराणिक ग्रंथों ने बताया है महत्व

दैनिक भास्कर

Jul 31, 2019, 06:09 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क.  ‘शिव’ का अर्थ कल्याण एवं ‘लिंग’ का अर्थ प्रतीक होता है, अर्थात् उस परमात्मा की कल्याणकारी सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक ही शिवलिङ्ग का शाब्दिक अर्थ है। शिवलिङ्ग पूजा गृहस्थों का परम धर्म है इसी धारणा से जहां कहीं भी कोई वृक्ष, पत्थर, पर्वत, शैलकूट यदि लिङ्ग की आकृति धारण किए हुए दिखता है, तो उसे भगवान् शिव का प्रतीक मानकर पूजा जाता है। महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन (मध्यप्रदेश) के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. उपेंन्द्र भार्गव  ने अमरनाथ के वैदिक और पौराणिक महत्व पर रिसर्च की है। 

डॉ. भार्गव के अनुसार अमरनाथ को अमरेश्वर भी कहा जाता है। स्कन्दपुराण में ‘महेश्वरखण्‍ड अरुणाचल माहात्म्य खण्‍ड’ में शिव के विभिन्न तीर्थों की महिमा की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ‘‘अमरेश तीर्थ सब पुरुषार्थों का साधक बताया गया है, वहां ॐकार नाम वाले महादेव जी और चण्डिका नाम से प्रसिद्ध पार्वती जी निवास करती हैं। मान्यता है कि जब भगवान् शिव ने देवी पार्वती को अमरकथा सुनाने का निश्चय किया तब उन्होंने अपने समस्त गणों को पीछे छोड़ दिया और अमरनाथ की गुफा की ओर बढ़ते गये। जहां अनंत नामक नाग को छोड़ा वह स्थान अनन्तनाग और जहां शेष नामक नाग को छोड़ा वह शेषनाग नाम से विख्यात है। इसी प्रकार जहां उन्होंने अपने नंदी बैल को छोड़ा वह स्थान बैलग्राम हुआ और बैलग्राम से अपभ्रंश होकर पहलगाम बना। अभिप्राय यह है कि जिस स्थान पर अमरेश्वर ने अमरकथा सुनाई वह स्थान जनशून्य था। फलस्वरुप इन नगरों के नामों से ही हमें शिवसायुज्य का आभास आज तक हो रहा है यही उस अमरकथा की अमरता का वास्तविक प्रमाण है।

  • सनातन धर्म में लिङ्ग पूजा और अमरनाथ

    लिङ्ग पुराण में एक कथा के अंतर्गत 74वें अध्याय में बताया गया है कि भगवान् ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने देवताओं की पूजा के योग्य विधिवत् कई प्रकार के लिङ्गों को बनाकर उन्हें देवताओं को प्रदान किया-

     

    लिङ्गानि कल्‍पयत्‍वैवं स्‍वाधिकारानुरूपत:। विश्‍वकर्मा ददौ तेषां नियोगाद्ब्रह्मण: प्रभो:।। (लिं.म.पु. 74-01)

     

    फिर इस प्रकार विश्वकर्मा ने समस्त देवी-देवताओं को बहुमूल्य रत्नों एवं धातुओं से निर्मित शिवलिङ्ग प्रदान किए। विष्णु को इन्द्रनील से बना, इन्द्र को पद्मराग और विश्रवस के पुत्र ने स्वर्णलिङ्ग आदि की पूजा की। इस प्रकार समस्त देवी-देवताओं ने ही सर्वप्रथम ब्रह्मा की आज्ञा से सोना, चांदी, तांबा, मिट्टी (पार्थिव), लोहा, स्फटिक, मोती, त्रिधातु, बालू (रेत),  काष्‍ठ (लकड़ी), मरकत, भस्म, बेलवृक्ष, गोबर, कुशा, रत्न, चंदन शीशा (पारद) आदि बहुमूल्य धातुओं से निर्मित शिवलिङ्गों की पूजा की।

  • छः तरह के शिवलिंग हैं मान्य

    पुराणसम्मतवचन के अनुसार प्रशस्त एवं परम पुण्यफल देने वाले शिवलिङ्गों को छ: प्रकार का बतलाया गया है जो कि विभिन्न द्रव्यों एवं धातुओं के संयोग से बने हैं-

    षड्विधं लिङ्गमित्‍याहुर्द्रव्‍याणां च प्रभेदत:। तेषां भेदाश्‍चतुर्युक्तचत्‍वारिंशदिति स्‍मृता:।। (लिं.म.पु., 74-13)
    तदनन्तर वे छह प्रकार के लिङ्गों के क्रमशः 40 विभाग हैं यहां क्रमशः 6 प्रकार के लिङ्गों का विस्तृत रूप से वर्णन भी किया है :-

    शैलजं प्रथमं प्रोक्तं तद्धि साक्षाच्‍चतुर्विधम्। द्वितीयं रत्‍नजं तच्‍च सप्‍तधा मुनिसत्तमा:।।
    तृतीयं धातुजं लिङ्गमष्‍टधा परमेष्ठिन:। तुरीयं दारूजं लिङ्गं तत्तु षोडशधोच्‍यते।।
    मृण्‍मयं पञ्चमं लिङ्गं द्विधा भिन्नं द्विजोत्तमा:। षष्‍ठं तु क्षणिकं लिङ्गं सप्‍तधापरिकीर्त्तितम्।। (लिं. म. पु. 74-14, 15, 16)

     

    उपरोक्त प्रमाण से निम्नलिखित 6 प्रकार के शिवलिङ्गों भेद स्पष्ट होते हैं... 
    1. शैलज - पत्थर से निर्मित।
    2. रत्‍नज – हीरे, मोती, पन्ना, नीलम, पुखराज आदि से निर्मित।
    3. धातुज – सोने, चांदी, तांबा, पीतल, लोहा, पारद आदि से निर्मित।
    4. दारुज – लकड़ी, वृक्ष, अर्क, बेल आदि से निर्मित।
    5. मृण्मय – लाल, काली, सफेद मिट्टी एवं बालू से निर्मित।
    6. क्षणिक – दही, घी, हिम आदि से निर्मित।

     

    अमरनाथ का स्वरूप हिममय (बर्फानी) है अतः उन्हें क्षणिक लिङ्ग कहा जा सकता है। उनका स्वरूप दर्शन अत्यंत अल्पकाल के लिए ही होता है अतः बाबा अमरेश्वर का दर्शन दुर्लभ है। अन्य प्रकार के शिवलिङ्गों यथा - शैलज, धातुज, रत्नज और मृण्‍मय आदि की प्राप्ति और दर्शन तो सरल हैं किंतु क्षणिक शिवलिङ्ग अत्यंत दुर्लभ और परमपुण्य फल को देने वाले हैं। लिङ्गपुराण के अनुसार क्षणिक शिवलिङ्ग मोक्ष प्रदान करने वाला है।

  • बर्फानी शिवलिंग के पूजन का महत्व

    लिङ्गमहापुराण में निर्देशित किया गया है कि ‘‘जो व्यक्ति स्कन्‍द और उमा सहित कुन्‍द के पुष्प के समान या दूध के समान सफेद शिवलिङ्ग को विधानपूर्वक स्थापित करता है वह मनुष्य के रूप में रुद्र हो जाता है। उस शुभ्र श्वेत लिङ्ग का दर्शन करने और स्पर्श करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। सौ युगों में भी उसके पुण्य को कहना संभव नहीं है’’।

     

    सनातन धर्म परंपराओं में शिवलिङ्ग को अत्यंत पवित्र माना गया है। अमरनाथ यात्रा का उद्देश्य उस पवित्र श्वेत हिमलिङ्ग का दर्शन करना है जिसके दर्शनों से अमृत की प्राप्ति, मोक्ष की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चतुर्विध पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि हेतु प्रयास करने का उपदेश किया गया है। अमरनाथ का दर्शन चारों पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाला एवं प्रत्यक्ष रूप से मोक्ष प्रदान करने वाला है जैसा कि पुराणवाक्य हैं-


    ‘‘दर्शनात्‍स्‍पर्शनात्तस्‍य लभते निर्वृतिं नरा:।‘’ (लिं. म.पु., 74-28)


    गृहस्थों के लिए चारों पुरुषार्थों का साधन अनिवार्य कहा गया है और शिवाराधना से उन्हें यह चारों पुरुषार्थों का फल और सिद्धि प्राप्त हो जाती है। किंतु मुमुक्षुओं को एक मात्र चतुर्थ पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ का साधन ही परम अभीष्ट हैं इसलिए मुमुक्षुओं के लिए भी लिङ्गपूजा का विधान करते हुए कहा गया है कि -

     

    तस्‍मात् सदाशिव: पूज्‍य: सर्वैरेव मनीषिभि:।पूजनीयो हि सम्‍पूज्‍यो ह्यर्चनीय: सदाशिव:।।
    लिङ्गरूपो महादेवो ह्यर्चनीयो मुमुक्षुभि:। शिवात् परतरो नास्ति भुक्तिमुक्तिप्रदायक:।।(स्‍कन्‍द पुराण माहे.ख. 19/68, 82)

     

    मुमुक्षुजनों को लिङ्गरूपी महादेव की आराधना करनी चाहिए, क्योंकि उनसे बढ़कर भुक्ति और मुक्ति देने वाले अन्य कोई भी देवता नहीं है। इसी तथ्य की पुष्टि महाभारत के अनुशासन पर्व में भी की गई हैं -

     

    नास्‍ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गति:। नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे।। (महाभारत अनु. प. 15/11)

     

    शिवजी के समान संसार में कोई देवता नहीं। वे ही समस्त सांसारिक जीवों को सद्गति  देते हैं। कल्याण और सुख देने में शिवजी से बढ़कर कोई दयालु नहीं और युद्ध करने में भी उनसे बढ़कर कोई पराक्रमी नहीं। लिङ्गपूजा के फल का विवेचन करते हुए भृङ्गीश संहिता मैं कहा गया है कि -

     

    प्रणम्‍य विधिवद् भक्‍त्‍या स्‍वाधालिङ्गं सनातनम्।
    नरो न लिप्‍यते पापै: कोटि जन्‍म समुद्भवै:।।

     

    विधिपूर्वक भक्ति से सनातन स्वधा लिङ्ग को प्रणाम कर मनुष्य करोड़ों जन्म में पैदा हुए पापों से लिप्‍त नहीं होता। अर्थात वह निष्पाप हो जाता है। समस्त प्रकार के शिवलिङ्गों में विशिष्ट स्थान रखने वाले अमरनाथ (अमरेश्वर शिव) की पूजा या दर्शनमात्र से अथवा वंदन करने से ही व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है-

     

    दर्शनात्‍स्‍पर्शनाच्‍चापि पूजानाच्‍चापि वन्‍दनात्।
    अमरेशस्‍य लिङ्गस्‍य मुच्‍यते सर्वकिल्विषै:।। (भृङ्गीश संहिता)

     

    अत: यह कथन करना श्रेयस्कर है कि बाबा अमरनाथ रूपी हिमलिङ्ग परम पवित्र हैं और लिङ्ग पूजा विधियों में सर्वाधिक पुण्य फल देने वाला है इसका महत्व भी अनिर्वचनीय है।

     

     

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