भीष्म अष्टमी 13 फरवरी को / महाभारत युद्ध के 16 साल बाद एक रात के लिए फिर से जीवित हुए थे भीष्म सहित अन्य योद्धा



bhishma ashtami on 13th february
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bhishma ashtami on 13th february

Dainik Bhaskar

Feb 12, 2019, 12:58 PM IST

रिलिजन डेस्क.  माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को भीष्म अष्टमी कहते हैं। यह बार यह व्रत 13 फरवरी, बुधवार को है। धर्म शास्त्रों के अनुसार, इस दिन भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर अपने प्राण त्यागे थे। इस मौके पर हम आपको महाभारत से जुड़ी कुछ रोचक बातें बता रहे हैं। ये बात तो सभी जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में पांडवों ने भीष्म, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, कर्ण आदि योद्धाओं का वध कर दिया था, लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि महाभारत युद्ध में मारे गए सभी वीर एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे। ये बात पढ़ने में थोड़ी अजीब जरूर लग सकती है, लेकिन इस घटना का पूरा वर्णन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत ग्रंथ के आश्रमवासिक पर्व में मिलता है। ये पूरी घटना इस प्रकार है-


कैसे जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए योद्धा?

  • महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। युधिष्ठिर धृतराष्ट्र और गांधारी की बहुत सेवा करते थे। इस तरह 15 साल गुजर गए। एक दिन धृतराष्ट्र ने सोचा कि पांडवों के साथ रहते-रहते अब बहुत समय हो गया है। इसलिए अब वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) ही उचित है।
  • गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय ने वन जाने का निर्णय लिया। इन सभी के साथ पांडवों की माता कुंती भी वन में चली गईं। यहां महर्षि वेदव्यास से वनवास की दीक्षा लेकर ये सभी महर्षि शतयूप के आश्रम में रहने लगे। 
  • इस प्रकार वन में रहते हुए धृतराष्ट्र आदि को लगभग 1 वर्ष बीत गया। एक दिन युधिष्ठिर के मन में वन में रह रहे धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती को देखने की इच्छा हुई। युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों और द्रौपदी को लेकर वन में आ गए। यहां मुनियों के वेश में अपने परिजनों को देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। 
  • धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती अपने पुत्रों व परिजनों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। अगले दिन धृतराष्ट्र के आश्रम में महर्षि वेदव्यास आए। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती से कहा कि आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का प्रभाव दिखाऊंगा। तुम्हारी जो इच्छा हो वह मांग लो। 
  • तब धृतराष्ट्र व गांधारी ने युद्ध में मृत पुत्रों तथा कुंती ने कर्ण को देखने की इच्छा प्रकट की। द्रौपदी आदि ने कहा कि वह भी अपने परिजनों को देखना चाहते हैं। महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ऐसा ही होगा। युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। 
  • ऐसा कहकर महर्षि वेदव्यास ने सभी को गंगा तट पर चलने के लिए कहा। महर्षि वेदव्यास के कहने पर सभी गंगा तट पर एकत्रित हो गए और रात होने का इंतजार करने लगे। रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने गंगा नदी में प्रवेश किया और पांडव व कौरव पक्ष के सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। 
  • थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, राजा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शकुनि, शिखंडी आदि वीर जल से बाहर निकल आए। उन सभी के मन में किसी भी प्रकार का अंहकार व क्रोध नहीं था। 
  • महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र व गांधारी को दिव्य नेत्र प्रदान किए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया। सारी रात अपने मृत परिजनों के साथ बिता कर सभी के मन में संतोष हुआ। अपने मृत पुत्रों, भाइयों, पतियों व अन्य संबंधियों से मिलकर सभी का संताप दूर हो गया। 
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