बुद्ध पूर्णिमा / शुद्ध मन, सबके लिए प्रेम और करूणा का संदेश देते हैं भगवान गौतम बुद्ध - डॉ. प्रणव पंड्या



Buddha Purnima 2019 story about guatam buddha by Dr. Pranav Pandya of Gayatri Parivar
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Buddha Purnima 2019 story about guatam buddha by Dr. Pranav Pandya of Gayatri Parivar

  • कैसे सुख और दुःख के अंतर को समझ पाए गौतम बुद्ध

Dainik Bhaskar

May 17, 2019, 01:52 PM IST

डॉ. प्रणव पंड्या

 

जीवन मंत्र डेस्क. वैशाख माह की पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा मनाई जाती है। इस साल यह 18 मई को मनाई जाएगी। आज यह जानें कि कपिलवस्तु के राजकुमार को कैसे दुःख और सुख का भेद पता चला।

 

कपिलवस्तु के राजकुमार गौतम बुद्ध को जान-बूझकर राजमहलों के ऐसे  वातावरण में रखा गया था कि दुख, रोग, शोक, बुढ़ापा, मृत्यु आदि क्या होते हैं, इनका इन्हें कुछ पता ही न था। उनके मन में एक जराग्रस्त वृद्ध को देख एक नवीन भाव का उदय हुआ और  वे बिना किसी से कहे-सुने मानव जीवन की समस्या पर विचार करने लगे। अभी तक वे इस संसार में सब व्यक्तियों को अपनी ही तरह स्वस्थ सुखी और आमोद-प्रमोद में मग्न समझते थे, पर आज उनको विदित हुआ कि सभी सांसारिक सुख क्षण स्थायी हैं और यहाँ सुख की बजाय दुु:ख का परिमाण अधिक है।

 

गौतम के चित्त में इस घटना के पश्चात् जो नया परिवर्तन हुआ वह दिन पर दिन सुदृढ़ होता गया और एक दिन आधी रात के समय वे राज-पाट, स्त्री-पुत्र सब कुछ त्याग कर संन्यासी बन कर निकल पड़े। उनका उद्देश्य था, ऐसा मार्ग तलाश करना, जिससे मनुष्यों को संसार के रोग-शोक से छुटकारा मिल सके। घोर तपस्या करके जब शारीरिक शक्ति अत्यंत क्षीण हो गई और चलना-फिरना भी कठिन हो गया, तब उनको समझ में आया कि केवल कष्ट सहन करने से यह समस्या हल नहीं हो सकती। इसके लिए आवश्यकता है, संसार की स्थिति और जीवन की समस्याओं पर उदार भाव से विचार किया जाए और निवृत्ति तथा प्रवृत्ति में सामंजस्य स्थापित करके ऐसे मध्यम मार्ग पर चला जाए, जिससे सांसारिक कर्त्तव्यों का सुचारू पालन होता रहे।

 

इस सिद्धान्त पर अच्छी तरह विचार करके उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए यह उपदेश दिया - संसार में जो कुछ भी दिख पड़ता है, वह सब शीघ्र नष्ट हो जाने वाला है। जो कुछ दिख पड़ता है, उसमें दुःख छिपा हुआ है। जब सभी चीजें नष्ट होने वाली हैं, तब इनके फंदे में क्यों फँसा जाए? तपस्या तथा उपवास द्वारा इनसे छुटकारा नहीं मिल सकता। छुटकारे की जड़ तो मन है। इस लिए धर्म का सीधा और सरल रास्ता यही है कि शुद्ध मन से काम करना, शुद्ध चित्त रखना। इसके लिए आवश्यक यह है कि-किसी प्रकार की हिंसा न की जाए। चोरी, दुराचार, झूठ, दूसरों के दोष ढूंढ़ना, अपवित्र भाषण करना, लालच करना, घृणा करना और अज्ञान से बचा जाए।

 

इस प्रकार  उपयोगी ज्ञान के समझ जाने पर उनका नाम बुद्ध (ज्ञानी) हो गया। उन्होंने लोगों को समझाया कि जो व्यक्ति इन नियमों का पालन करते हुए सबसे प्रेम-भाव रखेगा, राग-द्वेष से दूर रहेगा, वह अपने जीवन-काल में शरीरान्त होने पर भी समस्त अशुभ परिणामों से दूर रहेगा। इस बात की कोई आवश्यकता नहीं कि मनुष्य जंगल में जाकर तपस्या करे और भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी  आदि का कष्ट सहन करे। मुख्य बात यह है कि अपने चित्त को संतुलित रख कर किसी से दुर्व्यवहार न किया जाए। सच्चा धार्मिक वही है, जो हृदय से प्राणिमात्र के प्रति सद्भावना रखे और कल्याण की कामना करे। जो किसी से द्वेष न रखेगा, पीड़ितों और अभावग्रस्तों की सहायता से मुख नहीं मोड़ेगा, कुमार्ग से बचकर रहेगा, उसे जीवन-मुक्त ही समझना चाहिए।

 

बुद्ध  ने जो मनुष्यों को जिस स्वाभाविक धर्म का उपदेश दिया उसका आधार मुख्य रूप से मन की भावनाओं पर था। बाह्य आचरण को उन्होंने सदैव हीन कोटि का धर्म बतलाया, क्योंकि उसमें स्थिरता नहीं रहती और देश-काल के अनुसार बदलता रहता है। इसलिए वे किसी को शिष्य बनाने की दीक्षा देने में भी किसी प्रकार का आडम्बर नहीं करते थे।

 

जब सारि पुत्र तथा मौदगल्यायन जैसे प्रमुख भिक्षुओं ने उनसे प्रव्रजति करने की प्रार्थना की तो बुद्धजी ने यही कहा - आओ भिक्षुओ! धर्म तो स्पष्ट और सरल होता है। जब मनुष्य अनेक प्रकार की कामनाओं और इच्छाओं को त्याग कर कल्याण भावनाओं से सीधी-सादी शिक्षाओं पर आचरण करने लगता है, तो उसे स्वयं ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है और वह भव-बन्धनो से छुटकारा पा जाता है। इस बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर हमें भी गौतमबुद्ध के उपदेश के अनुसार निवृत्ति और प्रवृत्ति में सामजस्य स्थापित करके ऐसे  मध्यम मार्ग पर चलना चाहिए जिससे सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन होता रहे।

(लेखक- अखिल विश्व गायत्री परिवार प्रमुख, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एवं आध्यात्मिक चिंतक हैं)

 

 

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