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दिवाली विशेष / रावण वध के 20 दिन बाद राम अयोध्या लौटे, इसलिए दशहरे के 20वें दिन दिवाली मनाई जाती है

Dainik Bhaskar

Nov 07, 2018, 01:55 PM IST


deepawali vishesh jankari about ram came to ayodhya
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deepawali vishesh jankari about ram came to ayodhya

वेदों में: 3500 साल पहले लिखे गए ऋग्वेद में उल्लेख, शास्त्रों में लिखा- परिश्रम से ही लक्ष्मी मिलती हैं

 

लक्ष्मी पूजा का उल्लेख ऋग्वेद के श्रीसूक्त में है। ऋग्वेद 3500 साल पहले लिखा गया। लक्ष्मी पूजा की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। इसका उल्लेख महाभारत में भी मिलता है।

 

उपनिषदों में लक्ष्मी पूजा का जिक्र है, जो 3000 साल पहले लिखे गए। पाणिनि की अष्टाध्यायी में भी महाभारत का जिक्र है, जो 2700 साल पहले लिखी गई है। धीरे-धीरे इसमें रामायण, महाभारत के प्रसंग जुड़ते गए। राम ने दशहरे के दिन रावण वध किया था, 20 दिन अयोध्या आने में लगे। यही वजह है कि दशहरे के 20वें दिन दिवाली पड़ती है। उनके आगमन पर दीये जलाए गए थे।   दिवाली के बाद गन्ना ग्यारस यानी भारतीय लोक जीवन और गोप और कृषि संस्कृति के तहत गोवर्धन पूजा के अनुष्ठान जोेड़े गए।

 

लक्ष्मी पूजा के बारे में कहा गया है कि बिना परिश्रम लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती है। इसको लेकर भर्तृहरि ने लिखा है- 
 

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी... 
पाणिवंतो बलवंतो धनवंतो न संशय:।। 

 

अर्थात काम करने वाला व्यक्ति ही धनवान और बलवान होता है। आलसी और निकम्मों को लक्ष्मी की कृपा नहीं मिलती।

 

16वीं सदी में तुलसीदास ने लिखा है - चित्र कल्पतरु कामधेनु गृह लिखे न विपति नसावै यानी लक्ष्मी पर फूल चढ़ाने से लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होती। वास्तविक लक्ष्मी पूजा परिश्रम ही है।

 

कौटिल्य ने लिखा है कि - भगवती लक्ष्मी का उद्भव समुद्र मंथन से हुआ है। समुद्र मंथन का अर्थ उद्योग और परिश्रम से है। 

 

इतिहास में : 5 हजार साल पुरानी सभ्यता में भी साक्ष्य 
5000 साल पुरानी मोहनजोदड़ो सभ्यता की खुदाई में दीपक रखने की जगह और मिट्टी की मूर्ति के साथ दीपदान मिले हैं। इतिहासकार इसे दीपोत्सव से जोड़ते हैं। साथ ही वनस्पति देवी की पूजा के साक्ष्य भी मिले हैं।


करीब 2300 साल पहले कौटिल्य ने लिखा था कि लोग कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाकर दीपदान महोत्सव मनाते थे। इस मौके पर मशालें लेकर नृत्य भी करते थे। 


कंबोडिया में 12वीं सदी के अंकोरवाट मंदिर में समुद्र मंथन के चित्र उकेरे गए हैं। इन्हें दीपोत्सव से जोड़ा जाता है। 

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