दशहरा / खरीदारी के लिए आज पूरा दिन शुभ, शस्त्र पूजा के लिए दो और श्रीराम पूजा के लिए तीन मुहूर्त



dussehra 2019: shubh muhurat of shastra puja shree ram puja and shami puja Muhurat
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dussehra 2019: shubh muhurat of shastra puja shree ram puja and shami puja Muhurat

  • विजयादशमी को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है, इस दिन किए गए हर काम में सफलता मिलती है
     
  • महाभारतकाल में अर्जुन ने विजयादशमी के दिन ही शमी वृक्ष की पूजा की थी

Dainik Bhaskar

Oct 08, 2019, 07:41 AM IST

जीवन मंत्र डेस्क. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार आश्विन मास की दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र के संयोग पर आज विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा। इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। इसलिए इसे विजयपर्व के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम और धर्म की रक्षा के लिए रखे शस्त्रों का पूजन भी किया जाता है। वहीं, शारदीय नवरात्र के नौ दिन पूरे होने पर इस दिन दुर्गा प्रतिमाओं के साथ जवारे विसर्जन करने का भी विधान है।
 

  • अबूझ मुहूर्त है विजयादशमी

ज्योतिषाचार्य पं प्रफुल्ल भट्ट के अनुसार श्रवण नक्षत्र और पूर्णा तिथि का संयोग होने से विजयादशमी को अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है। क्योंकि इस तिथि और नक्षत्र में किया गया हर काम पूर्ण होता है और किए गए काम में सफलता और विजय मिलती है, लेकिन दशहरे के वक्त देवशयन चल रहा होता है। इसलिए इस मुहूर्त में विवाह और वास्तु पूजा के अलावा सभी शुभ कार्य बिना समय देखे किए जा सकते हैं।
 

  • आज विजय मुहूर्त है महत्वपूर्ण

आज का हर क्षण शुभ है। इसलिए व्यापार शुभारंभ, यात्रा, शस्त्र-पूजा, कार्यालय शुभारंभ, संपत्ति क्रय-विक्रय आदि के लिए दिन में कोई मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं है। पं भट्ट के अनुसार आश्विन मास शुक्ल पक्ष की दशमी पर विजय मुहूर्त का अत्यधिक महत्व है। यह 8 अक्टूबर यानी आज दोपहर 02:10 से 02:50 तक रहेगा। पांडवों से जुड़ी विराट राज्य की विजय की कथा के कारण इस दिन शमी वृक्ष की पूजा भी बेहद शुभ मानी जाती है।

 

  • जवारे विसर्जन और वनस्पति पूजा मुहूर्त

सुबह 9:20 से 10:42 तक
सुबह 10:42 से  दोपहर 12:10 तक
दोपहर 12:10 से 01:35 तक
 

  • श्रीराम और शस्त्र पूजा मुहूर्त

सुबह 11:42 से दोपहर 12:22 तक
दाेपहर 02:10 से 02:50 तक 

 

  • वनस्पति पूजा 

विजयदशमी पर दो विशेष प्रकार की वनस्पतियों के पूजन का महत्व बताया गया है। शमी वृक्ष और विष्णु-क्रांता। शमी वृक्ष का पूजन करके इसकी पत्तियों को स्वर्ण पत्तियों के रूप में एक-दूसरे को ससम्मान प्रदान किया जाता है। इस परंपरा में विजय उल्लास पर्व की कामना के साथ समृद्धि की कामना करते हैं। वहीं अपराजिता यानी विष्णु-क्रांता पौधे की पूजा की जाती है। यह पौधा भगवान विष्णु को प्रिय है और प्रत्येक परिस्थिति में सहायक बनकर विजय प्रदान करता है। नीले रंग के पुष्प का यह पौधा आसानी से मिल जाता है। घरों में समृद्धि के लिए तुलसी की तरह इसकी भी पूजा की जाती है। ठीक इसी क्रम से विजयादशमी के दिन भगवान रामचंद्रजी के लंका पर चढ़ाई करने के लिए प्रस्थान करते समय शमी वृक्ष ने भगवान की विजय का उद्घोष किया था। इसलिए ही विजयकाल में अपराजिता और शमी पूजन किया जाता है।

 

  • शस्त्र (आयुध) पूजा 

विजयादशमी पर्व धर्म की विजय के उपलक्ष में मनाया जाता है। देवी ने राक्षसों को मारकर धर्म और देवताओं की रक्षा की थी, वहीं भगवान श्रीराम ने भी धर्म की रक्षा के लिए रावण को मारा था। इसलिए इस दिन देवी और भगवान श्रीराम के शस्त्रों की पूजा की जाती है। वहीं मंदिरों और घरों में धर्म की रक्षा के लिए रखे शस्त्रों का भी पूजन किया जाता है।
आयुध पूजा नवरात्रि के दौरान आती है और देश के कई हिस्सों में यह लोकप्रिय है। आयुध पूजा को शास्त्र पूजा और अस्त्र पूजा के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन समय में आयुध पूजा हथियारों की पूजा करने के लिए थी, लेकिन वर्तमान में इस दिन सभी प्रकार के यंत्रों की पूजा की जाती है। दक्षिण भारत और भारत के अन्य हिस्सों में इस दिन शिल्पकार विश्वकर्मा पूजा के समान अपने उपकरणों और औजारों की पूजा भी करते हैं। वहीं इस दिन शस्त्रों की पूजा के साथ ही वाहन पूजा भी की जाने लगी है। इस दिन लोग शस्त्रों के अलावा अपने वाहनों सहित कार, स्कूटर और मोटर बाइक की भी पूजा करते हैं।
 
 

  • महाभारत काल में विजयादशमी 

दुर्योधन ने पांडवों को जुए में पराजित कर बारह साल के वनवास के साथ तेरहवें साल में अज्ञातवास की शर्त दी थी। तेरहवें साल यदि उनका पता लग जाता तो उन्हें पुनः बारह साल का वनवास भोगना पड़ता। इसी अज्ञातवास में अर्जुन ने अपना धनुष एक शमी वृक्ष पर रखा था और स्वयं वृहन्नला के वेश में राजा विराट के यहां काम करते थे। जब गोरक्षा के लिए विराट के पुत्र धृष्टद्युम्न ने अर्जुन को अपने साथ लिया, तब अर्जुन ने शमी वृक्ष की पूजाकर के उस पर से अपने हथियार उठाने की अनुमति मांगी थी। इसके बाद शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी।  

 

  • विजय प्रस्थान का प्रतीक

भगवान राम के समय से यह दिन विजय प्रस्थान का प्रतीक निश्चित है। भगवान राम ने रावण से युद्ध हेतु इसी दिन प्रस्थान किया था और कई दिनों बाद रावण से युद्ध के लिए इसी दिन को चुना। इसके बाद द्वापर युग में अर्जुन ने धृष्टद्युम्न के साथ गोरक्षा के लिए इसी दिन प्रस्थान किया था। वहीं मराठा रत्न शिवाजी ने भी औरंगजेब के विरुद्ध इसी दिन प्रस्थान करके हिन्दू धर्म की रक्षा की थी। भारतीय इतिहास में अनेक उदाहरण हैं, जब हिन्दू राजा इस दिन विजय-प्रस्थान करते थे। दशहरे का उत्सव शक्ति और शक्ति का समन्वय बताने वाला उत्सव है।

 

  • दशहरे का व्यावहारिक महत्व

अश्विन माह के शुक्लपक्ष के शुरुआती 9 दिनों तक शक्ति पूजा की जाती है। यानी अपने अंदर की सकारात्मक ऊर्जा को पहचानकर देवी रूप में उसका पूजन किया जाता है। इन 9 दिनों तक शक्ति पूजा करने के बाद दसवें दिन शस्त्र पूजा की जाती है। यानी अच्छे कामों का संकल्प लिया जाता है। इसी दिन अपनी सकारात्मक शक्तियों से नकारात्मक शक्तियों पर जीत प्राप्त की जाती है यानी खुद की बुराई पर जीत हासिल करना ही विजयपर्व माना गया है।

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