त्योहार / बकरीद आज, दस दिन पहले ही दिख जाता है ईद-उल-जुहा का चांद



eid ul adha 2019: when and how to celebrate bakra eid
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eid ul adha 2019: when and how to celebrate bakra eid

Dainik Bhaskar

Aug 12, 2019, 09:16 AM IST

जीवन मंत्र डेस्क. ईद उल जुहा के चांद का दीदार 4 अगस्त को ही हो चुका है। जिसके अनुसार अब 12 अगस्त को भारत में ईद मनाई जाएगी। इसे ईद-उल-अजहा या बकरीद भी कहा जाता है। त्याग और बलिदान का ये पर्व ईद-उल-फितर यानी मीठी ईद के लगभग 2 महीने बाद आता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार यह त्योहार हर साल जिलहिज्ज के महीने में आता है। इस महीने हज किया जाता है। ईद-उल-जुहा का चांद जिस रोज नजर आता है उसके 10वें दिन बकरीद मनाई जाती है।

ईद-उल-फितर के बाद इस्लाम धर्म का यह दूसरा प्रमुख त्यौहार माना जाता है। इस्लाम में इस त्योहार को मुख्य रूप से कुर्बानी पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस त्योहार की शुरुआत हजरत इब्राहिम से हुई थी। ईद-उल-जुहा के मौके पर हज़रत इब्राहिम अल्लाह के हुक्म पर अल्लाह के प्रति अपनी वफादारी दिखाने के लिए अपने बेटे हजरत इस्माइल को कुर्बान करने पर राजी हुए थे। ईद-उल-जुहा को ईद-ए-कुर्बानी भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन नियमों का पालन करते हुए कुर्बानी दी जाती है।

 

 

 

ईद-उल-जुहा से जुड़ी बातें, क्यों और कैसे मनाया जाता है ये त्योहार

  1. परंपरा की शुरुआत 

    • मान्यता है कि बकरीद का त्योहार पैगंबर हजरत इब्राहिम द्वारा शुरू हुआ था। इन्हें अल्लाह का पैगंबर माना जाता है। 
    • इब्राहिम दुनिया की भलाई के कार्यों में लगे रहें। उन्होंने लोगों की सेवा की, लेकिन करीब 90 साल की उम्र तक उन्हें कोई संतान नहीं हुई थी। 
    • फिर उन्होंने खुदा की इबादत की जिससे उन्हें चांद-सा बेटा इस्माइल मिला, लेकिन सपने में दिखे खुदा ने उन्हें आदेश दिया कि उन्हें अपनी प्रिय चीज की कुर्बानी देनी होगी। 
    • अल्लाह के आदेश को मानते हुए उन्होंने अपने सभी प्रिय जानवर कुर्बान कर दिए। एक दिन हजरत इब्राहिम को फिर से यह सपना आया तब उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का प्रण ले लिया। 
    • अपने प्रिय बेटे की कुर्बानी उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर दे दी और जब उनकी आखें खुली तो उन्होंने पाया कि उनका बेटा तो जीवित है और खेल रहा है। बल्कि उसकी जगह वहां एक दुम्बे की कुर्बानी खुद ही हो गई थी। 
    • दुम्बा बकरे की प्रजाति का बकरे जैसा ही जानवर होता है जिसकी दुम गोल होती है।
    • कहा जाता है कि बस तभी से दुम्बे या भेड़-बकरे की कुर्बानी की प्रथा चली आ रही है।

  2. ऐसे मनाई जाती है बकरीद 

    • बकरीद पर अपने प्रिय बकरे की कुर्बानी दी जाती है। बकरीद से कुछ दिन पहले बकरा खरीदकर लाना होता है ताकि उस बकरे से लगाव हो जाए। 
    • जिन लोगों ने अपने घरों में बकरा पाल रखा होता है वह उस बकरे की कुर्बानी देते हैं। 
    • बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग अल सुबह की नमाज अदा करते हैं। इसके बाद बकरे की कुर्बानी देने का कार्य शुरु किया जाता है। 
    • कुर्बानी के बाद बकरे का मीट तीन हिस्सों में बांटा जाता है। गोश्त के इन तीन भागों में एक भाग गरीबों के लिए, दूसरा भाग रिश्तेदारों में बांटने के लिए और तीसरा भाग अपने लिए रखा जाता है। 
    • जानकारों का कहना है कि यह सलाह शरीयत में दी गई है।

  3. कुर्बानी के कायदे

    1. कुर्बानी का मतलब जज्बा और भावनाएं अच्छी होनी चाहिए। कुर्बानी का बकरा लाख रुपए का हो या हजार रुपये का हो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। 

     

    2. कुर्बानी देने वालों के दायरे में वो लोग आते हैं जो साढ़े 52 तोला (612 ग्राम 360 मिलिग्राम) चांदी के मालिक हों। यानी जिन लोगों के पास करीब 613 ग्राम चांदी जितनी संपत्ति हो वो लोग कुर्बानी दे सकते हैं। जिन लोगों के पास इतना भी पैसा न हो उनके लिए कुर्बानी देना जरूरी नहीं है।

     

    3. जो व्यक्ति अपनी कमाई का ढ़ाई फीसदी दान देता है। साथ ही समाज की भलाई के लिए धन के साथ हमेशा आगे रहता है। उसके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है।

     

    4. जिस किसी व्यक्ति के पास पहले से कर्ज है तो उसके लिए कुर्बानी जरूरी नहीं है। कुर्बानी देने वाले के ऊपर उस समय कोई कर्ज नहीं होना चाहिए। 

     

    5. ऐसे जानवर की कुर्बानी नहीं दी जाती जिसको शारीरिक बीमारी या भैंगापन हो, सींग या कान का अधिकतर भाग टूटा हो। 

     

    6. छोटे जानवरों में भेड़ और बकरे आते हैं। इनसे छोटे पशु की कुर्बानी नहीं दी जा सकती। बड़े जानवरों में भैंसे या ऊंट की कुर्बानी दी जाती है।

     

    7. ईद की नमाज के बाद पशु के गोश्त के तीन हिस्से होते हैं। एक खुद के इस्तेमाल के लिए, दूसरा गरीबों के लिए और तीसरा संबंधियों के लिए। वैसे ज्यादातर लोग सभी हिस्सों का गरीबों में बांट देते हैं।

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