मान्यता / ब्रह्मा, विष्णु और महेश, इन तीनों देवों में विष्णुजी को श्रेष्ठ क्यों माना जाता है?



facts about lord vishnu, brigu rishi and vishnuji, story of brigu rishi
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facts about lord vishnu, brigu rishi and vishnuji, story of brigu rishi

  • विष्णुजी का स्वरूप है चतुर्भुज, उनके चार हाथों में गदा, चक्र, शंख और कमल है, भृगु ऋषि ने भगवान को मारा था पैर

Dainik Bhaskar

Oct 07, 2019, 05:45 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क। भगवान के तीन स्वरूप बताए गए हैं। ये हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश। ब्रह्माजी ने इस सृष्टि की रचना की है, विष्णुजी पालन कर रहे हैं और महेश यानी शिवजी सृष्टि का संहार करते हैं। विष्णु का शाब्दिक अर्थ है जो सभी में व्याप्त हो, वही विष्णु है। उज्जैन के भागवत कथाकार पंडित मनीष शर्मा के अनुसार भगवान विष्णु का चतुर्भुज स्वरूप है। उनके दो हाथों में गदा और चक्र के रूप में दंड देने वाले हथियार हैं। दो अन्य हाथों में शंख और कमल है, ये पुरस्कार देने वाली निधियां हैं।
इस मंत्र के साथ की जाती है भगवान विष्णु की स्तुति-
शांताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगं।
लक्ष्मीकांतं कमलनयनं योगिभर्ध्यानगम्यं।
वंदे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।

इस मंत्र का सरल अर्थ ये है कि विष्णुजी शांत प्रकृति के देव हैं। शेषनाग पर वे विश्राम करते हैं। जिसकी नाभि पर कमल स्थित है, जो देवताओं स्वामी हैं, जो विश्व को धारण करने वाले हैं। भगवान का रंग बादलों की तरह श्याम होने पर वे सुंदर दिखाई देते हैं और लक्ष्मी के पति हैं। कमल के समान जिनकी आंखें हैं, जो योगियों के आराध्य हैं, ऐसे विष्णु को हम नमस्कार करते हैं। जो भव सागर से जो पार कराते हैं और भय का हरण करते हैं। जो सभी लोकों के एकमात्र स्वामी हैं।

  • ऋषि भृगु ने विष्णुजी की छाती पर मारा था पैर

पुरानी मान्यताओं के अनुसार भृगु ऋषि ने विष्णुजी को तीनों देवों में श्रेष्ठ घोषित किया है। प्रचलित कथा के अनुसार महर्षि भृगुु जानना चाहते थे कि तीनों देवों में श्रेष्ठ कौन है? इसके लिए वे सबसे पहले शिवजी के पास गए। उस समय शिवजी माता सती के साथ थे। सभी रुद्रगणों ने ऋषि को शिवजी से मिलने से रोक दिया। इसके बाद भृगु ब्रह्माजी के पास पहुंचे। उस समय ब्रह्माजी सभी देवताओं के साथ दरबार में थे। भृगु वहां पहुंचे तो ब्रह्माजी ने उनका स्वागत नहीं किया तो वे वहां से क्रोधित होकर विष्णु लोक जाने के लिए चल दिए। जब भृगु विष्णु लोक पहुंचे, तब विष्णु सो रहे थे। भृगु ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोध से विष्णु की छाती पर पैर मार दिया। इस प्रकार जगाए जाने पर भी विष्णुजी ने धैर्य रखा और क्षमा मांगते हुए कहा कि महर्षि आपको चोट तो नहीं लगी? मैं बड़ा कठोर हृदय हूं। उन्होंने महर्षि के पैर पकड़ लिए और सहलाने लगे। विष्णु की इस महानता से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें देवों में श्रेष्ठ घोषित किया।

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