गंगा दशहरा / समय है समाज गंगा की तरफ लौटे, वरना कहीं गंगा स्वर्ग ना लौट जाए - स्वामी चिदानंद सरस्वती

Dainik Bhaskar

Jun 11, 2019, 03:36 PM IST



Ganga dussehra 2019 Ganga dashahara 2019 Parmarth niketan rishikesh head swami Chidanand Saraswati
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Ganga dussehra 2019 Ganga dashahara 2019 Parmarth niketan rishikesh head swami Chidanand Saraswati

  • गंगा मोक्षदायिनी लेकिन इस समय उसे प्रदूषण से मुक्त करने की जरूरत

  • गंगा एक्शन परिवार और परमार्थ निकेतन ऋषिकेष प्रमुख स्वामी चिदानंद सरस्वती का विशेष लेख

जीवन मंत्र डेस्क. ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को प्रतिवर्ष गंगा दशहरा मनाया जाता है। आज के दिन ही भगीरथ की घोर तपस्या के पश्चात माँ गंगा का स्वर्ग से धरती पर अवतरण हुआ था। मां गंगा राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार करने के लिये धरती पर आयी थी और तब से लेकर आज तक गंगा करोड़ों लोगों को मुक्ति, शांति और आनंद प्रदान कर रही हैं। मां गंगा का दर्शन, स्पर्श, पूजन और स्नान ही मानव मात्र के लिए काफी है। मां गंगा तो उत्तराखण्ड से निकली एक पावन नदी हैं, भारत जैसे आध्यात्मिक राष्ट्र में गंगा को मां का स्थान दिया है। गंगा सदियों से करोड़ों लोगों की आस्था और वेद मंत्रों का संगीत अपने जल में समाहित कर गंगोत्री से गंगा सागर तक लोगों को मुक्ति और शांति प्रदान करती है।

 

गंगोत्री से गंगासागर तक गंगा के तट पर अनेक तीर्थ है, 50 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका केवल गंगा के जल पर निर्भर है और 25 करोड़ लोग तो पूर्ण रूप से गंगा जल पर आश्रित हैं। गंगा, आस्था ही नहीं आजीविका का भी स्रोत है। नदियां केवल जल का ही नहीं बल्कि जीवन का भी स्रोत होती हैं। विश्व की अधिकतर संस्कृतियों और सभ्यताओं का जन्म नदियों के तटों पर ही हुआ है। नदियां संस्कृति की संरक्षक हैं और संवाहक भी हैं। नदियों ने मनुष्य को जन्म तो नहीं दिया परन्तु जीवन तो दिया ही है। नदियां तो पूरे विश्व में हैं परन्तु मां गंगा केवल भारत में ही हैं।

 

जिस प्रकार मनुष्य को जीने का अधिकार है उसी प्रकार हमारी नदियों को भी स्वछन्द होकर अविरल व निर्मल रूप से प्रवाहित होने का पूर्ण अधिकार है। नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता है, फिर भी जगह-जगह प्रदूषित जल गंगा में प्रवाहित किया जाता है। नदियों में शौच करना, फूल और पूजन सामग्री डालना, उर्वरक, कीटनाशक, घरों, शहरों, उद्योगों, एवं कृषि से निकलने वाला अपशिष्ट जल बिना पुर्ननवीनीकरण एवं उपचारित किए विशाल मात्रा में नदियों एवं प्रकृति में प्रवाहित कर दिया जाता है, जो हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करता है। इससे प्रकृति के मूल्यवान पोषक तत्व भी नष्ट हो रहे हैं तथा जलीय जीवन भी प्रभावित हो रहा है। अनुपचारित जल से पेचिस, टायफाइड, पोलियो जैसी बीमारियों में वृद्धि हो रही है। स्वच्छ जल, स्वच्छता एवं स्वच्छता सुविधाओं की आवश्यकता मनुष्य के साथ जलीय प्राणियों एवं पर्यावरण को भी है।

 

तेजी से बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, और अवैज्ञानिक विकास के कारण जल संसाधनों  विशेष रूप से नदियों का क्षरण हुआ है। भारत की 14 बड़़ी नदियां प्रदूषण ग्रस्त हैं, जिसमें से एक गंगा भी है। गंगा और अन्य नदियों में कूडा-कचरा, प्लास्टिक, नालों के गंदे पानी के साथ ही अर्ध जले शवों को भी प्रवाहित किया जाता है। आंकड़ों के अनुसार बनारस में एक साल में लगभग 33,000 से अधिक शवों का दाह होता है और अनुमानतः 700 टन से अधिक अधजले कंकाल प्रवाहित किये जाते हैं, जिससे पतित पावनी गंगा का जल प्रदूषित हो रहा है, यह आंकड़ें तो एक शहर के है। देश के अन्य धार्मिक स्थलों, गंगा तटों और कैचमेंट एरिया की स्थिति तो और भी चिंताजनक है अतः हमारी शवदाह की पद्धति में परिवर्तन करना नितांत आवश्यक है। कई बार तो अर्धजले शवों को गंगा में  प्रवाहित किया जाता है इसे भी पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिये। गंगा में प्रवाहित किए गए शव और अर्धजले शवों से जलीय जीवन प्रभावित होता है, शव जहां पर जाकर रुकते हैं उसके आस-पास का वातावरण दुर्गंधयुक्त एवं प्रदूषित हो जाता है।

 

जागरूकता के अभाव में लोग मृत जानवरों को भी जल में प्रवाहित करते हैं, जिससे जल प्रदूषित होता है। भण्डारा, धार्मिक आयोजन और कुम्भ के दौरान प्लास्टिक के थैले, कप-प्लेट, बैग एवं प्लास्टिक को पूर्णरूप से प्रतिबंधित किया जाना चाहिये नहीं तो इसके घातक परिणाम सामने आ सकते हैं।

 

पृथ्वी को ’’जलीय ग्रह’’ कहा गया है और इसका सबसे अच्छा स्रोत महासागर और नदियां हैं। पृथ्वी का 71 प्रतिशत भाग जल से घिरा है। आज बढ़ते प्रदूषण के कारण जलीय ग्रह भी बिना जल के होने की कगार पर खड़ा है। प्रदूषण के कारण एक ओर तो जल संकट बढ़ रहा है वही दूसरी ओर जलीय जीवन नष्ट हो रहा है। वर्तमान की बात करें तो भारत में विश्व की कुल आबादी का 18 प्रतिशत है, परन्तु कुल जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत है। देश के जल संकट का समाधान करने के लिये नदियों को जीवंत रखना नितांत आवश्यक है।

 

आदि काल से ही हमारे ऋषि-मुनियों ने नदियों और प्राकृतिक संसाधनों को अध्यात्म से जोड़ा था ताकि उनका संरक्षण किया जा सके। उनके लिये लोगों के दिलों में आस्था के साथ अपनत्व का भाव भी जागृत होता रहे। समय के साथ अब सब कुछ बदलता नजर आ रहा है। जानकारी के अभाव तथा अवैज्ञानिक विकास के कारण हमने प्राकृतिक संसाधनों का दोहन किया, उन्हें प्रदूषित किया और करते ही जा रहे है जिसका परिणाम जीवनदायिनी  नदियों का अमृततुल्य जल विषाक्त होता जा रहा है। इतना ही नहीं नदियां सूखती जा रही है कुछ नदियों का अस्तित्व अब बचा ही नहीं, कुछ किताबों और कहानियों तक सीमित हो गईं और गंगा जैसी नदियों के जीवन पर भी संकट के बादल मंडरा रहे है। गंगा ने हमें जीवन दिया अब गंगा को जीवन देने की बारी है।

 

गंगा सहित भारत की अन्य नदियों को स्वच्छ करने के लिये करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट बनाए गए और लागू भी हुए, फिर भी गंगा स्वर्ग लौटने की स्थिति में है। गंगा सहित भारत की अन्य नदियों को धरा पर देखना है तो अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा, सोच को बदलना होगा और गंगा को नदी की तरह नहीं, बल्कि एक जाग्रत स्वरूप, भारत की पहचान और हमारी अमूल्य के रूप में संरक्षण प्रदान करना होगा यही हो गंगा दशहरा पर हमारा संकल्प।

 

सबसे अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में गंगा जी के लिए जो कार्य किए जा रहे हैं, वह पहले कभी नहीं हो पाया था। अगले पांच वर्षों में बहुत कुछ होने की सम्भावनाएं भी हैं। मुझे पूरा विश्वास है ऐसा नहीं ’कहीं लौट न जाए गंगा’ बल्कि लगता है हमें मां गंगा की ओर लौटना होगा। तभी यह सब संभव हो पाएगा। सरकार के साथ-साथ हम सभी का जो सरोकार है उसे भी जोड़ना होगा। एक सेतु बनाना होगा, यह भगीरथ सेतु होगा, जो सभी को जोड़ेगा और सब से जुड़ेगा। इस नवोदित प्रयास से हम सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंच पाएंगे।

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