असफलता के कारण / 14 बातें हैं जो जप, तप, साधना या पूजा को सफल नहीं होने देती हैं



Gayatri parivar 14 things which are the reason of loss in spirituality Dr. Pranav pandya
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Gayatri parivar 14 things which are the reason of loss in spirituality Dr. Pranav pandya

  • आध्यात्मिक जगत में असफलता के कई कारण हैं 
  • अक्सर लोग 14 में से किसी एक या दो चीजों में उलझकर रह जाते हैं और साधनाएं निष्फल हो जाती हैं
     

Dainik Bhaskar

Sep 10, 2019, 05:52 PM IST

डॉ. प्रणव पंड्या. संसार के किसी भी कार्य में सफलता पाने के लिए जो मंजिल तय करनी पड़ती है, उसे साधना कहा जाता है। इस साधना में यदि विघ्न-बाधाएं उपस्थित हो जाएं, तो प्रायः मंजिल बीच में ही छूट जाती है। जीवन का भौतिक पहलू हो या आध्यात्मिक, कोई भी निरापद नहीं है। सांसारिक कार्यों में सफलता पाने के इच्छुक व्यक्ति मार्ग में पड़ने वाली आर्थिक, तकनीकी, प्रतिस्पर्द्धात्मक आदि बाधाओं से छुटकारा पाने का मार्ग भी पहले से ही निर्धारित कर लेते हैं अथवा उनका सामना करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाते हैं। अध्यात्म मार्ग में भी कम विघ्न बाधाएं नहीं होती हैं। 
आध्यात्मिक एवं सांसारिक उपलब्धियों की बाधाओं में अंतर मात्र इतना ही है कि भौतिक प्रगति के मार्ग में बाह्य विघ्न बाधाएँ अधिक होती हैं, जबकि आत्मिकी क्षेत्र में मनुष्य की स्व  उपार्जित विघ्न बाधाएँ ही प्रधान होती है। आत्मिक मार्ग के प्रत्येक पथिक को महान् कार्यों, ईश्वर प्राप्ति आदि के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं से परिचित होना आवश्यक है, जो इस प्रकार हैं-

 

अस्वस्थता- साधक यदि रोगी हो, बीमार रहता हो, तो उसके लिए नियमित रूप से साधना, उपासना, स्वाध्याय, सत्संग का लाभ उठा पाना कठिन होता है।

 

खान-पान का असंयम- खान-पान के संबंध में कहावत प्रचलित है- ‘जैसा खाय अन्न वैसा बने मन’। तामसी एवं असंयम पूर्ण भोजन से चित्त में चंचलता तथा दोष पूर्ण विचार उत्पन्न होते हैं, जिससे चिंतन विकृत होता चला जाता है। इसीलिए साधना काल में साधक को सात्विक, पौष्टिक तथा प्राकृतिक रसों से परिपूर्ण सादा आहार ही ग्रहण करना चाहिए।

 

संदेह- गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने ‘संशयात्मा विनष्यति’ तक कह डाला है। बड़े और महान् कार्य समय एवं श्रम साध्य होते हैं। इसमें शंका-आशंका करने वालों को सफलता नहीं मिलती। इसके लिए दृढ़ विश्वासी, संकल्प के धनी व्यक्ति ही सफल हो पाते हैं। इसलिए अध्यात्म मार्ग में बढ़ने वालों को अटूट श्रद्धा एवं दृढ़ विश्वास रखना चाहिए। बार-बार संदेह किसी भी कार्य को असफल ही करता है।

 

सद्गुरु का अभाव- गुरु बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वह उस विषय विशेष का पूर्ण ज्ञाता हो। अनभिज्ञ, अल्पज्ञ व्यक्ति को जो अध्यात्म क्षेत्र में कुछ नहीं जानता, अपना गुरु या  मार्गदर्शक बनाना अनुचित है।

 

प्रसिद्धि- सच्चे साधक को प्रसिद्धि के विपरीत ठोस कार्यों द्वारा साधना को महत्त्व देना चाहिए। पूर्ण सफलता मिल जाने पर यश तो छाया के रूप में पीछे-पीछे दौड़ने लगता है।

 

नियमबद्धता का अभाव- किसी भी कार्य को ठीक एक ही समय पर नियमपूर्वक करते रहने से उस कार्य की आदत बन जाती है। नियमितता के अभाव में कोई भी साधना सफल नहीं होती।

 

कुतर्क- कुतर्कों को त्याग कर साधक को आत्मा की आवाज सुनना और उसका अनुसरण करना चाहिए, क्योंकि सामाजिक रीति-रिवाज, मर्यादा, धर्म, ईश्वर, अस्तित्व यह सब विषय ऐसे हैं, जिन्हें तर्क द्वारा हल नहीं किया जा सकता।

 

आलस्य- उदासीनता, उपेक्षा व निराशा की भावनाओं के मिश्रण से आलस्य का जन्म होता है। आलस्य एक भयंकर बीमारी के समान है। आलस्य के वशीभूत होकर मनुष्य अपनी कार्य कुशलता को ही खो डालता है। आलस्यवश कार्य न करना, तो पतन पराभव का कारण ही बनता है।

 

अल्प में संतोष- हर हालत में सन्तुष्ट रहना, यह तो ईश्वरीय गुण है। थोड़ा-सा पढ़कर थोड़ा-सा पूजा-पाठ करके, थोड़ी सी खेती बागवानी करके, थोड़ी-सी समाज सेवा करके संतुष्ट हो जाना तो अवगुण ही माना जाएगा।

 

वासना- इन्द्रियों को संतुष्ट कर पाना आज तक किसी भी साधन सम्पन्न व्यक्ति के लिए संभव नहीं हो सका। एक बार की तृप्ति दूसरी बार की तृप्ति का आकर्षण बन जाती है। कठोरतापूर्वक इनके दमन से ही वासना में नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है।

 

ब्रह्मचर्य का अभाव- प्राण शक्ति, स्फूर्ति, बुद्धि यह सब वीर्य के ऊर्ध्वगामी होने से प्राप्त होती है। अस्तु, वीर्य की रक्षा प्राणपण से की जानी चाहिए। विवाहित हों, तो केवल संतानोत्पादन के लिए वीर्य-दान की प्रक्रिया अपनाई जाय अथवा कठोरतापूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया जाय। इससे प्रत्येक साधना सधती है।

 

कुसंग- अध्यात्म मार्ग के पथिक को बुरे कर्म, बुरे विचारों वाले लोगों से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा किसी न किसी रूप में उसके विचार आप पर प्रभावी हो ही जाएँगे।

 

परदोष दर्शन- दूसरों के दोषों को देखने में अपनी शक्ति खर्च न करें, आपके अंतःकरण में लगी  अचेतन की फिल्म भी दूसरों के दुर्गुणों को अपने अंदर आत्मसात कर लेती है।

 

संकीर्णता- हम सभी सत्य की खोज में दौड़ रहे हैं। कोई भी पूर्ण सत्य को प्राप्त नहीं कर सका। यह मानकर दूसरों के धर्म, उनकी मान्यताओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाएँ। कट्टरता की संकीर्णता साधना मार्ग का सबसे बड़ा अवगुण है।

 

(लेखक देव सस्कृति विश्व विद्यालय के कुलाधिपति और आध्यत्मिक चिंतक है )

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