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हरतालिका तीज 12 सितंबर को, इसकी कथा के साथ जानिए क्यों और कैसे किया जाता है ये व्रत

Hartalika Teej 2018: हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है।

Danik Bhaskar | Sep 11, 2018, 04:00 PM IST

हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को किया जाता है। इस दिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं सुबह स्नान के बाद निर्जल और बिना अन्न खाए व्रत रखने का संकल्प लेती हैं। फिर पूरे दिन बिना कुछ खाए और बिना पानी पिए पूरे दिन और रात भगवान की पूजा के साथ भजन-किर्तन करती हैं। पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं अपना व्रत तोड़ती हैं और अन्न ग्रहण करती हैं। इस व्रत में दिन के हर प्रहर में भगवान शिव और माता पार्वती जी की पूजा करती हैं। ये व्रत पारिवारिक सुख, दाम्पत्य सुख और संतान अदि से जुड़े शुभ फल देता है। इस दिन जो महिलाएं विधि-विधान और पूरी श्रद्धा भाव से इस व्रत को करती हैं उन्हें अपने मन के अनुरूप ही पति मिलता है। साथ ही दाम्पत्य जीवन भी सुखमय रहता है।

कैसे करें ये व्रत -

- इस दिन महिलाएं घर को साफ-स्वच्छ कर तोरण-मंडप आदि से सजाएं।

- एक पवित्र चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश जी, माता पार्वती एवं उनकी सखी की आकृति (प्रतिमा) बनाएं। प्रतिमाएं बनाते समय भगवान का स्मरण करते रहें।

- देवताओं का आह्वान कर कई तरह की पूजन सामग्रियों से उन देवी-देवताओं की पूजा करें।

- व्रत और पूजा रात भर चलती है। महिलाएं और कन्याएं जागरण करते हुए कथा-पूजन के साथ कीर्तन करें।

- हर प्रहर की पूजा में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, अशोक, मदार, धतुरा और केवड़ा चढ़ाएं।

माता पर्वती की पूजा के लिए ये मंत्र बोलें-

- ऊं उमायै नम:

- ऊं पार्वत्यै नम:

- ऊं जगद्धात्र्यै नम:

- ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम:

- ऊं शांतिरूपिण्यै नम:

- ऊं शिवायै नम:

भगवान शिव की पूजा इन मंत्रों से करें-

- ऊं हराय नम:

- ऊं महेश्वराय नम:

- ऊं शम्भवे नम:

- ऊं शूलपाणये नम:

- ऊं पिनाकवृषे नम:

- ऊं शिवाय नम:

- ऊं पशुपतये नम:

- ऊं महादेवाय नम:

हरतालिका तीज व्रत कथा -

लिंग पुराण की एक कथा के अनुसार मां पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे।
इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर मां पार्वती के पिता के पास पहुंचे, जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब मां पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वह बहुत दुखी हो गई और जोर-जोर से विलाप करने लगी। फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वह यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गई और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गई।
भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।