उपासना / गायत्री को माना जाता है वेद माता, इन्हीं से हुई है वेदों की उत्पत्ति, देवी की पूजा से विचार होते हैं पवित्र

Dainik Bhaskar

May 17, 2019, 04:19 PM IST


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  • गायत्री मंत्र का जाप करने से बढ़ती है एकाग्रता, दिन में तीन समय में कर सकते हैं जाप

जीवन मंत्र डेस्क। सभी देवी-देवताओं की पूजा में माता गायत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। देवी गायत्री को वेद माता कहा जाता है, इन्हीं से वेदों की उत्पत्ति हुई है। गायत्री मंत्र जाप के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय श्रेष्ठ है। मध्याह्न काल यानी दोपहर और सायंकाल यानी शाम के समय भी मंत्र जाप कर सकते हैं। इस मंत्र के जाप से एकाग्रता बढ़ती है। मन शांत होता है और तनाव दूर होता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार नारद पुराण में लिखा है कि-
गायत्री जाह्नवी चोमे सर्व पाप हरे स्मृतो।
गायत्रीच्छन्दसां माता लोकस्य जाह्नवी॥

इस श्लोक का अर्थ यह है कि गायत्री और गंगा, दोनों ही पापों को नष्ट करने वाली हैं। गायत्री वेदमाता और गंगा लोकमाता है।
वृहदयोगी याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है कि-
नास्ति गंगासमं तीर्थं न देव: केशवात् पर:।
गायत्र्यास्तु परं जायं न भूतो न भविष्यति॥

इसका अर्थ यह है कि गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, श्रीकृष्ण के समान कोई देवता नहीं और गायत्री से श्रेष्ठ जाप करने योग्य कोई मंत्र न हुआ है और न होगा।

गायत्री मंत्र जाप से जुड़ी खास बातें

  1. गायत्री शब्द का अर्थ

    गायत्री शब्द का अर्थ यह है कि गान या जाप करने वाले की रक्षा करने वाली माता।
    देवी गायत्री की पूजा में 24 अक्षरों वाले महामंत्र का जाप किया जाता है।
    मंत्र- ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्॥ 

    गायत्री मंत्र का अर्थ: सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते है, परमात्मा का वह तेज हमारी बुद्धि को सद्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

  2. गायत्री पूजा की सामान्य विधि

    गायत्री की पूजा साकार यानी प्रतिमा पूजन के रूप में भी की जाती है। पूजा के लिए एक चौकी पर गायत्री की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा के समय, धूप, दीप, नैवेद्य, फल-फूल आदि का उपयोग करें। साधना निराकार रूप में भी की जाती है। इसे मानसी पूजा कहते हैं। इसके लिए सूर्य का चित्र या दीपक या अग्नि को सामने बैठकर गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है। मंत्र जाप के समय मेरुदंड अर्थात कमर को सीधा रखकर पद्मासन में बैठें। पूजा के समय हमारा मुंह को पूर्व दिशा की ओर रखें।

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