मान्यता / पूजा में भगवान की परिक्रमा करने की परंपरा, इससे मिलती है सकारात्मक ऊर्जा



importance of parikrama, old traditions about worship in Hinduism, mythology about worship in hindi
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importance of parikrama, old traditions about worship in Hinduism, mythology about worship in hindi

  • सभी देवी-देवताओं की प्रदक्षिणा करने की संख्या अलग-अलग है, सूर्य की सात और हनुमानजी की तीन परिक्रमा करनी चाहिए

Dainik Bhaskar

Sep 16, 2019, 06:10 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क। पूजन कर्म में कई चरण होते हैं। हार-फूल चढ़ाए जाते हैं, दीपक जलाकर आरती की जाती है, भोग लगाया जाता है, वस्त्र आदि चीजें अर्पित की जाती हैं। इन सब के साथ ही पूजा करते समय भगवान की परिक्रमा करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि मंदिर में या भगवान की प्रतिमा की परिक्रमा करने से पुण्य बढ़ता है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार परिक्रमा करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

  • परिक्रमा की संख्या

पं. शर्मा के अनुसार सूर्य देव की सात, श्रीगणेश की चार, श्री विष्णु और उनके सभी अवतारों की पांच, श्री दुर्गा की एक, हनुमानजी की तीन, शिवलिंग की आधी परिक्रमा करनी चाहिए। शिवलिंग के संबंध में मान्यता है कि जलधारी को लांघना नहीं चाहिए, जलधारी तक पंहुचकर परिक्रमा को पूर्ण मान लिया जाता है। इसीलिए शिवलिंग की आधी परिक्रमा करनी चाहिए।

  • दाहिने हाथ की ओर शुरू करें परिक्रमा

भगवान की मूर्ति और मंदिर की परिक्रमा हमेशा दाहिने हाथ की ओर से शुरू करनी चाहिए, क्योंकि प्रतिमाओं में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा उत्तर से दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। सीधे हाथ की ओर से परिक्रमा करने पर हम मूर्तियों के आसपास रहने वाली सकारात्मक ऊर्जा ग्रहण कर पाते हैं। मन को शांति मिलती है और नकारात्मकता दूर होती है। दाहिने का अर्थ दक्षिण भी होता है, इस वजह से परिक्रमा को प्रदक्षिणा भी कहा जाता है। अगर प्रतिमा के आसपास परिक्रमा करने का स्थान नहीं है तो एक ही जगह पर गोल घूमकर भी परिक्रमा की जा सकती है।

  • इस मंत्र के साथ करें देव परिक्रमा

यानि कानि च पापानि जन्मांतर कृतानि च।
तानि सवार्णि नश्यन्तु प्रदक्षिणे पदे-पदे।।

इस मंत्र का सरल अर्थ यह है कि जाने अनजाने में किए गए और पूर्वजन्मों के भी सारे पाप प्रदक्षिणा के साथ-साथ नष्ट हो जाए। परमेश्वर मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें।

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