- श्रीकृष्ण, बलराम, देवकी, रोहिणी, वसुदेव के साथ ही पूरे यदुवंश का श्राद्ध किया था अर्जुन ने
Jul 08, 2019, 05:00 PM IST
जीवन मंत्र डेस्क। महाभारत युद्ध में पांडवों ने कौरवों को हरा दिया, दुर्योधन का वध हो गया, इसके बाद युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ। युद्ध के बाद गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया था कि जिस तरह कौरव वंश का नाश हुआ है, ठीक इसी तरह आपके वंश का भी नाश होगा। श्रीकृष्ण ने गांधारी का ये श्राप स्वीकार किया था। युधिष्ठिर के राजा बनने के बाद श्रीकृष्ण अपनी द्वारिका नगरी पहुंच गए। जानिए इसके बाद की खास बातें...
- गांधारी के श्राप की वजह से एक दिन यदुवंश के सभी योद्धा मदिरा के नशे में आपस में लड़-लड़कर मारे गए। इस प्रकार यदुवंश का नाश हो गया।
- यदुवंश के नाश के बाद श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस तरह शेषनागजी के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए।
- बलरामजी के स्वधाम लौटने के बाद श्रीकृष्ण एक पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, उस समय वहां जरा नाम का एक शिकारी आया हुआ था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह शिकारी वहां पहुंचा तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा।
- बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। कुछ देर बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए।
- श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए।
