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राजा की कोई संतान नहीं थी, उनके गुरु ने कहा कि किसी सुपात्र को अपना पुत्र बना लो, कुछ दिन बाद उन्होंने एक भिखारी को अपना राज्य सौंप दिया, क्योंकि उसकी एक बात राजा को अच्छी लगी थी

दूसरों के दुख दूर करने के लिए अपने सुख का त्याग करना ही सबसे बड़ा धर्म है

Dainik Bhaskar

Jan 10, 2019, 05:57 PM IST
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रिलिजन डेस्क। पुराने समय में एक राजा बहुत ही धार्मिक थे और अपनी प्रजा का ध्यान रखते थे। राजा वृद्ध हो गए थे, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्हें इस बात की चिंता रहने लगी कि उनकी मृत्यु के बाद इस राज्य और प्रजा का क्या होगा।

> राजा ने ये बात अपने गुरु को बताई तो गुरु ने कहा कि राजन अब आपको किसी सुपात्र को अपना पुत्र बना लेना चाहिए। गुरु की ये राजा को समझ आ गई और इसके लिए राजी हो गए।

> कुछ दिनों बाद राजा की चिंता और अधिक बढ़ गई थी, क्योंकि उन्हें कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहा था। राजा का मानना था उनका उत्तराधिकारी वही होगा जो दूसरों के दुख दूर करने लिए अपने सुख का भी त्याग कर सके।

> एक दिन वे अपने महल की खिड़की में खड़े थे, बाहर एक भिखारी बैठा था, उसके सामने एक पत्तल पर कुछ रोटियां रखी थीं। वह खाने ही वाला था कि वहां एक बूढ़ा आ गया और खाना मांगने लगा। भिखारी ने अपनी पत्तल उठाकर पूरा खाना उसे दे दिया।

> राजा ने ये सब देखा तो उन्होंने भिखारी को अपने महल में बुलवा लिया और उसे ऊंचे आसन पर बैठने के लिए कहा। भिखारी आसन पर नहीं, बल्कि नीचे बैठ गया। राजा ने उसे कहा कि मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता हूं और अपना पूरा राज्य तुम्हें सौंपना चाहता हूं।

> वह व्यक्ति राजा से बोला कि महाराज मैं आपका राज्य नहीं ले सकता, मैं राज-पाठ लेकर क्या करूंगा। त्याग ही असली धर्म है, यही मोक्ष का मार्ग है।

> राजा ने कहा कि तुम ही इस राज्य के योग्य उत्तराधिकारी हो, तुम दूसरों के दुख को अपना दुख समझते हो और उसके लिए अपना सुख त्याग कर सकते हो। यही एक राजा का सबसे बड़ा गुण है। राजा ने उस युवक को राज्य सौंप दिया।

कथा की सीख

इस कथा की सीख यही है कि जो व्यक्ति अपने सुख से ज्यादा दूसरों के सुख को महत्व देता है, वही श्रेष्ठ इंसान होता है। दूसरों की मदद करना ही धर्म है।

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