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वृद्ध राजा को नहीं मिला था संतान का सुख, राजा के गुरु ने कहा कि किसी योग्य व्यक्ति को अपना पुत्र बना लो, बहुत ढूंढने के बाद एक भिखारी को राजा ने अपना उत्तराधिकारी बना दिया

dainikbhaskar.com

Apr 17, 2019, 08:12 PM IST

जो व्यक्ति दूसरों के दुख को अपना दुख समझता है, वह हर जगह मान-सम्मान पाता है

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रिलिजन डेस्क। पुरानी लोक कथा के अनुसार एक राजा वृद्ध हो गए थे, लेकिन उन्हें संतान का सुख नहीं मिला था। राजा को इस बात की चिंता रहने लगी कि उनकी मृत्यु के बाद इस राज्य और प्रजा का क्या होगा?

> राजा ने ये बात अपने गुरु को बताई तो गुरु ने कहा कि राजन अब आपको किसी योग्य व्यक्ति को अपना पुत्र बना लेना चाहिए। गुरु की ये बात राजा को समझ आ गई और इसके लिए राजी हो गए और योग्य व्यक्ति ढूंढने लगे। कुछ दिन बाद राजा की चिंता और अधिक बढ़ गई, क्योंकि उन्हें कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिल रहा था।

> राजा का मानना था उनका उत्तराधिकारी वही होगा जो दूसरों के दुख दूर करने लिए अपने सुख का भी त्याग कर सके। एक दिन वे अपने महल की खिड़की में खड़े थे, बाहर एक भिखारी बैठा था, उसके सामने एक पत्तल पर कुछ रोटियां रखी थीं। वह खाने ही वाला था कि वहां एक बूढ़ा आ गया और खाना मांगने लगा। भिखारी ने अपनी पत्तल उठाकर पूरा खाना उसे दे दिया।

> ये सब देखकर राजा ने भिखारी को अपने महल में बुलवा लिया और उसे ऊंचे आसन पर बैठने के लिए कहा। भिखारी आसन पर नहीं, बल्कि नीचे बैठ गया। राजा ने उसे कहा कि मैं तुम्हें अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता हूं और अपना पूरा राज्य तुम्हें सौंपना चाहता हूं।

> उस व्यक्ति ने राजा से कहा कि महाराज मैं आपका राज्य नहीं ले सकता, मैं राज-पाठ लेकर क्या करूंगा? त्याग ही असली धर्म है, यही मोक्ष का मार्ग है।

> राजा ने कहा कि तुम ही इस राज्य के लिए योग्य उत्तराधिकारी हो, तुम दूसरों के दुख को अपना दुख समझते हो और उसके लिए अपना सुख त्याग कर सकते हो। यही एक राजा का सबसे बड़ा गुण है। राजा ने उस युवक को राज्य सौंप दिया।

कथा की सीख

> इस कथा की सीख यही है कि जो व्यक्ति अपने सुख से ज्यादा दूसरों के सुख को महत्व देता है, वही श्रेष्ठ इंसान होता है। ऐसे लोग हर जगह मान-सम्मान प्राप्त करते हैं।

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