सेठ ने संत के चरण छूए और सोने के सिक्कों से भरी थैली दान देकर बोला कि बाबा मुझे आशीर्वाद दीजिए, संत ने कहा कि मैं भिखारियों का दान नहीं लेता, ये सुनकर सेठ हैरान हो गया और बोला कि बाबा मैं तो धनवान हूं

इच्छाओं से मन अशांत रहता है, जब तक इच्छाएं रहेंगी, तब तक मन को शांति नहीं मिल सकती

Apr 16, 2019, 08:11 PM IST

रिलिजन डेस्क। एक लोक कथा के अनुसार पुराने समय में एक सेठ प्रसिद्ध संत के पास गया और चरण स्पर्श किए। सेठ ने सोने के सिक्कों से भरी थैली दान में दी और बोला कि बाबा मुझे आशीर्वाद दीजिए।

> संत ने कहा कि ये थैली उठाओ, मैं भिखारियों का दान नहीं लेता। ये सुनकर सेठ हैरान हो गया, वो बोला कि बाबा मैं तो धनवान हूं। मेरे पास असंख्य सोने की मुद्राएं हैं, बड़ा घर, बहुत सारी जमीन-जायदाद है। आप मुझे भिखारी क्यों बोल रहे हैं?

> संत ने कहा कि अगर तू धनी है तो फिर तूझे किस बात का आशीर्वाद चाहिए?

> सेठ ने कहा कि महाराज मेरा मन बहुत अशांत है, मुझे शांति चाहिए और मैं इस राज्य का सबसे अमीर इंसान बनना चाहता हूं। इसीलिए दिन-रात मेहनत कर रहा हूं। अगर आप आशीर्वाद दे देंगे तो ये संभव हो जाएगा।

> संत ने कहा कि जब तेरी इच्छाओं का ही कोई ठिकाना नहीं है तो तू खुद को भिखारियों से अलग क्यों मानता है?

> जो लोग वासनाओं और कामनाओं में उलझे रहते हैं, वे कभी धनी नहीं माने जा सकते। इच्छाओं का अंत नहीं होता है और जब तक इच्छाएं रहेंगी, तब तक हमारा मन शांत नहीं हो सकता। सेठ को संत की बात समझ आ गई और वह मोह-माया छोड़कर संत का शिष्य बन गया।

प्रसंग की सीख

इस छोटे से प्रसंग की सीख यह है कि इच्छाओं की वजह से ही हमारा मन अशांत रहता है, जब तक मन में इच्छाएं रहेंगी, हमें शांति नहीं मिलेगी।

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