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संत ने खोला आश्रम और आयोजित की वाद-विवाद प्रतियोगिता, अंत में पुरस्कार ऐसे शिष्य को मिला, जिसने प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया, सभी शिष्य नाराज हुए तो संत ने बताया इसका रहस्य

संत ने बताया सिर्फ बोलकर नहीं, हमें अपने कर्मों से करनी चाहिए दूसरों की सेवा

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2018, 04:25 PM IST
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रिलिजन डेस्क। एक संत ने समाज को संस्कारी और सेवाभावी बनाने के लिए एक आश्रम शुरु किया। संत प्रसिद्ध थे, इसीलिए उनके आश्रम में काफी शिष्य पढ़ने के लिए आने लगे। एक दिन संत ने वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया। प्रतियोगिता का विषय था - जीवों पर दया ही प्राणियों की सेवा।

> इस प्रतियोगिता में कई शिष्यों ने भाग लिया। सभी ने अपने-अपने स्तर पर श्रेष्ठ भाषण दिया। संत ने सभी का भाषण ध्यान से सुना।

> जब पुरस्कार देने का समय आया तो संत ने एक ऐसे शिष्य को सम्मानित किया, जिसने इस प्रतियोगिता में भाग ही नहीं लिया था।

> ये देखकर सभी शिष्य नाराज हो गए। तब संत ने सभी को शांत किया और इसका रहस्य बताया।

> संत ने सभी शिष्यों को बताया कि प्रतियोगिता से पहले उन्होंने आश्रम के मुख्य द्वार के पास एक बीमार बिल्ली को छोड़ दिया था। आप सभी वहीं से आए, लेकिन किसी ने भी इस बिल्ली की ओर ध्यान नहीं दिया। सिर्फ ये युवक ने इस बिल्ली को देखा और इसका इलाज करवाया। इसके इसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ा।

> सेवा सिर्फ वाद-विवाद का या बोलने का विषय नहीं है। ये जीने की एक कला है। इस युवा ने भाषण नहीं दिया, लेकिन अपने बिल्ली की सेवा की। इसी वजह से इसे पुरस्कार दिया गया।

प्रसंग की सीख

इस प्रसंग की सीख ये है कि अधिकतर लोग दूसरों की सेवा करने की बात तो करते हैं, लेकिन वे कर्म नहीं करते हैं। जो व्यक्ति खुद किसी की सेवा नहीं करता है, वो दूसरों को सेवा करने की प्रेरणा भी नहीं दे सकता है।

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