बजट / कौटिल्य के अर्थशास्त्र के मुताबिक बजट टेक्निकल और प्रोफेशनल नहीं, बल्कि नैतिकता पर आधारित होना चाहिए

According to Kautilya, the budget should be based on ethics, not technical and professional.
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According to Kautilya, the budget should be based on ethics, not technical and professional.

  • वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में कालिदास के महाकाव्य रघुवंशम् का जिक्र किया  
  • कौटिल्य अर्थशास्त्र के अलावा शुक्रनीति, बृहस्पति संहिता और महाभारत में भी कर नीति के बारे में बताया गया है
  • कौटिल्य के अनुसार- राजकोष बढ़ाना और उसे जनता के कल्याण में कैसे लगाया, इस व्यवस्था को ही बजट कहा जाता है

विनय भट्ट

विनय भट्ट

Feb 01, 2020, 03:57 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. कौटिल्य के लिखे अर्थशास्त्र में आयकर का जिक्र मिलता है। यह ग्रंथ करीब 2300 साल पहले लिखा गया है। इसमें कौटिल्य ने लिखा है कि सरकार (राजा) की सत्ता उसके राजकोष की मजबूती पर निर्भर करती है। राजस्व और कर सरकार के लिए आमदनी है, जो उसे अपनी जनता (प्रजा) की सेवा, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए मिलती है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किया महाकाव्य रघुवंश का जिक्र

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण में कालिदास के महाकाव्य रघुवंशम् के प्रथम सर्ग के 18 वें श्लोक का जिक्र किया है। जिसमें महाकवि कालिदास ने राजा दिलीप की कर व्यवस्था के बारे में बताया है।


श्लोक

प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।

सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रवि: ॥ (रघुवंश १ । १८)
इस श्लोक का अर्थ है कि जैसे सूर्य हजार गुना पानी बरसाने के लिए ही पृथ्वी के जल का बहुत कम भाग लेता है, वैसे ही सूर्यवंशी राजा भी अपनी प्रजा के हितके लिए ही प्रजा से बहुत कम मात्रा में कर लिया करते थे।

  • बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. कौशल किशोर मिश्रा के अनुसार कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में बताया है कि राजा की सबसे बड़ी ताकत उसका खजाना होता है। यानी अपने राज्य और जनता की तरक्की के लिए सबसे पहले खजाना कैसे बढ़ाया जाए, इस बात पर ध्यान देना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार राजकोष बढ़ाना और उसे जनता के कल्याण में कैसे लगाया, इस व्यवस्था को ही बजट कहा जाता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कर की व्यवस्था का खासतौर से ध्यान रखा गया है। इसके मुताबिक राजा यानी देश पर शासन करने वाले को नैतिकता को ध्यान में रखते हुए अपना बजट बनाना चाहिए। नैतिकता के आधार पर ही किसी राज्य या देश की उन्नति हो सकती है।

कौटिल्य के अनुसार कैसा हो बजट
1. पहला काम टैक्सेशन ठीक करना 

कौटिल्य के मुताबिक जनता पर टैक्स का बोझ कम होना चाहिए। इसलिए मधु सिद्धांत के अनुसार टैक्स लेना चाहिए। यानी मधुमक्खी जिस तरह फूलों से रस लेकर शहद बनाती है, जिससे फूलों को नुकसान नहीं होता और शहद से लोगों को फायदा मिलता है। 

2. सबसे हाशिए पर मौजूद तबके को बढ़ावा देना
अर्थशास्त्र के मुताबिक राजा का काम समाज के सबसे 'न्यून वर्ग' या सबसे हाशिए पर खड़े वर्ग को बढ़ावा देना होता है। इस तरह सरकार के बजट में दूसरी महत्वपूर्ण बात 'न्यून वर्ग' वालों को ऊपर उठाना है। सरकार को ऐसी योजनाएं, सुविधाएं या छुट देनी चाहिए, जिससे गरीब लोगों का स्तर बढ़े।

3. पर्यावरण
कौटिल्य ने देश के समग्र विकास के लिए अपने अर्थशास्त्र में पर्यावरण को महत्व दिया है। पर्यावरण ठीक करने के लिए किसी टैक्स का प्रावधान होना चाहिए। अगर पर्यावरण को कोई नुकसान पहुंचाए तो उसके लिए दंड भी होना चाहिए। कौटिल्य ने कृषि और जल संसाधन को पर्यावरण का प्रमुख अंग माना है। अर्थशास्त्र के अनुसार राजा को इनके लिए ऐसी योजनाएं बनानी चाहिए जिससे जनता को सुविधा मिले और उसके बदले कर के रूप में राजकोष बढ़े।

4. पशुपालन

कौटिल्य ने पशु को राजकोष का अंग मानते हुए पशु को राजा की संपत्ति बताया है। अर्थशास्त्र के अनुसार खेती के लिए पशु जरूरी है ताकि दूध, खाद और अन्य जरूरी चीजें मिलती रहें। वहीं, राजा की सेना में हाथी और घोड़े जरूरी अंग माने गए थे। 

5. निर्माण कार्य 
कौटिल्य के अनुसार राजा को अपने राज्य यानी देश के विकास के लिए जरूरी चीजों का निर्माण करवाना चाहिए। इनमें कुएं, बावड़ियां, तालाब और अन्य चीजें शामिल थीं। आज के दौर में उसी तरह सरकार को भी देश की उन्नति के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए खर्चा करना चाहिए।

अर्थशास्त्र के अनुसार समानता के आधार पर विकास 
अलब्धलाभार्था लब्धपरिरक्षणी रक्षितविवर्धनी वृद्धस्य तीर्थे प्रतिपादनी च 

अर्थ - कौटिल्य के अनुसार जो प्राप्त न हो वो प्राप्त करना, जो प्राप्त हो गया हो उसे संरक्षित करना, जो संरक्षित हो गया उसे समानता के आधार पर बांटना।

श्रेणियों के अनुसार कर निर्धारण
कौटिल्य के समय शराब पर सबसे ज्यादा कर वसूला जाता था। इसके अनुसार पूरे देश में शराब पर टैक्स सबसे ज्यादा होना चाहिए। टैक्स का फैसला नैतिकता के मुताबिक अलग-अलग श्रेणियों में होना चाहिए। कौटिल्य के समय सबसे कम टैक्स भोजन और कृषि पर लिया जाता था। 

प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है इनकम टैक्स का जिक्र
हजारों साल पहले लिखी गई मनुस्मृति में आयकर के बारे में लिखा है कि शास्त्रों के अनुसार राजा कर लगा सकता है। करों का संबंध प्रजा की आय और व्यय से होना चाहिए। इसमें ये भी कहा गया था कि राजा को हद से ज्यादा कर लगाने से बचना चाहिए। करों की वसूली की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रजा अदायगी करते समय मुश्किल महसूस न करें। इसके अलावा शुक्रनीति, बृहस्पति संहिता और महाभारत के शांतिपर्व के 58 और 59वें अध्याय में भी इस बारे में जानकारी दी गई है। वहीं तुलसीदास जी ने भी अपनी दोहावली में अप्रत्यक्ष रूप से कर का जिक्र किया है। उनके अनुसार सूर्य की तरह कर लिया जाना चाहिए।

दोहा
बरषत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ ॥

गोस्वामी तुलसीदास ने अप्रत्यक्ष कर संग्रह की बात कही है। उन्होंने इसके लिए सूर्य का उदाहरण लिया है। सूर्य जिस प्रकार पृथ्वी से अनजाने में ही जल खींच लेता है और किसी को पता नहीं चलता, किन्तु उसी जल को बादल के रूप में इकट्‌ठा कर वर्षा में बरसते देखकर सभी लोग प्रसन्न होते हैं। इसी रीति से कर संग्रह करके राजा द्वारा जनता के हित में कार्य करना चाहिए।

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