गीता / श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर दिया था उपदेश, इसमें है कई विद्याओं का वर्णन

Sri Krishna gave sermon to Arjuna in the form of verses, it contains description of many disciplines
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Sri Krishna gave sermon to Arjuna in the form of verses, it contains description of many disciplines

  • गीता में दिए गए श्रीकृष्ण के ज्ञान में छुपे हैं मैनेजमेंट सूत्र, जिनकी मदद से दूर हो सकती है हर परेशानी

Dainik Bhaskar

Dec 06, 2019, 04:15 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को गीता जयंती का पर्व मनाया जाता है। इस बार ये पर्व 8 दिसंबर, रविवार को है। एक-दूसरे को मारने का प्रण ले चुके कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध शुरू होने से पहले योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने 18 अक्षौहिणी सेना के बीच मोह में फंसे और कर्म से विमुख अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को छंद रूप में यानी गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहते हैं। चूंकि उपदेश देने वाले स्वयं भगवान थे, अत: इस ग्रंथ का नाम भगवद्गीता पड़ा। 

  • गीता माहात्म्य पर श्रीकृष्ण ने पद्म पुराण में कहा है कि भवबंधन (जन्म-मरण) से मुक्ति के लिए गीता अकेले ही पर्याप्त ग्रंथ है। गीता का उद्देश्य ईश्वर का ज्ञान होना माना गया है। भगवद्गीता में कई विद्याओं का वर्णन है, जिनमें चार प्रमुख हैं- अभय विद्या, साम्य विद्या, ईश्वर विद्या और ब्रह्म विद्या।
  • माना गया है कि अभय विद्या मृत्यु के भय को दूर करती है। साम्य विद्या राग-द्वेष से छुटकारा दिलाकर जीव में समत्व भाव पैदा करती है। ईश्वर विद्या के प्रभाव से साधक अहंकार और गर्व के विकार से बचता है। ब्रह्म विद्या से अंतरात्मा में ब्रह्मा भाव को जागता है।

  • गीता में दिए गए श्रीकृष्ण के ज्ञान में छुपे मैनेजमेंट सूत्र

  • क्षमतानुसार कार्य 

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। 

कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।। 

अर्थ - कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर प्राणी से कर्म करवाती है। 

मैनेजमेंट सूत्र - परिणामों के डर से अगर कुछ नहीं करेंगे, तो ये मूर्खता है। खाली बैठना भी कर्म ही है, जिसका परिणाम आर्थिक और समय की हानि के रूप में मिलता है। सारे जीव प्रकृति के अधीन हैं, वो हमसे अपने अनुसार कर्म करवा ही लेगी। हमें क्षमता और विवेक के आधार पर कर्म करते रहना चाहिए। 

  • अवगुण छोड़ना 

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। 

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तरमादेतत्त्रयं त्यजेत्।। 

अर्थ - काम, क्रोध व लोभ। यह तीन प्रकार के नरक के द्वार अर्थात अधोगति में ले जाने वाले हैं, इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए। 

मैनेजमेंट सूत्र - काम यानी इच्छाएं, गुस्सा व लालच ही सभी बुराइयों के मूल कारण हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इन्हें नरक का द्वार कहा है। अगर हमें किसी लक्ष्य को पाना हैं तो ये 3 अवगुण छोड़ देना चाहिए। ये अवगुण हमारे मन में रहेंगे, हमारा मन अपने लक्ष्य से भटकता रहेगा। 

  • इंद्रियों पर वश 

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः 

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।। 

अर्थ - श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्यों को चाहिए कि वह संपूर्ण इंद्रियों को वश में करके दृढ़तापूर्वक स्थित हो, क्योंकि जिस पुरुष की इंद्रियां वश में होती हैं, उसकी ही बुद्धि स्थिर होती है। 

मैनेजमेंट सूत्र - जो मनुष्य इंद्रियों पर काबू रखता है उसकी बुद्धि स्थिर होती है। जिसकी बुद्धि स्थिर होगी, वह अपने क्षेत्र में बुलंदी की ऊंचाइयों को छूता है और जीवन के कर्तव्यों का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करता है। 

  • इच्छाओं पर नियंत्रण 

विहाय कामान् य: कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृह:। 

निर्ममो निरहंकार स शांतिमधिगच्छति।।

अर्थ - जो मनुष्य सभी इच्छाओं व कामनाओं को त्याग कर और अहंकार रहित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे ही शांति प्राप्त होती है। 

मैनेजमेंट सूत्र - मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। शांति प्राप्त करने के लिए इच्छाओं को मिटाना होगा। हम जो भी कर्म करते हैं, उसके साथ अपने अपेक्षित परिणाम को साथ में चिपका देते हैं। पसंद के परिणाम की इच्छा हमें कमजोर करती है।

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