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वरसिद्धि विनायक मंदिर में प्रवेश के पहले लोग कबूल करते हैं पाप, कुंड में स्नान के बाद करते हैं दर्शन

6 महीने पहले
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  • आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में कनिपक्कम गांव में है स्वयं-भू गणपति का मंदिर
  • कुंए से रक्तधारा के साथ निकली थी ये प्रतिमा
  • लोग विवाद सुलझाने के लिए कुंड में डुबकी लगाकर भगवान के सामने उठाते हैं सौगंध

जीवन मंत्र डेस्क. वैसे तो भगवान गणपति के भारत भर में कई अनोखे मंदिर हैं। लेकिन, आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में कनिपक्कम नाम के गांव में मौजूद वरसिद्धि विनायकस्वामी देवस्थानम् इन सारे मंदिरों में सबसे अलग और अनूठा है। वरसिद्धि विनायक स्वामी मंदिर में भगवान गणपति की स्वयं-भू प्रतिमा है। जो एक कुएं से निकली थी। इस मंदिर की खासियत ये है कि यहां मंदिर में प्रवेश के पहले ही व्यक्ति अपने पापों को स्वीकार करता है, फिर मंदिर के कुंड में स्नान करने के बाद यहां दर्शन करता है। मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में मान्यता इतनी गहरी है कि लोग यहां अपने कई बड़े विवाद भगवान की प्रतिमा के सामने सौगंध उठाकर सुलझा लेते हैं। 


चित्तूर के कनिपक्कम गांव की ख्याति इस गणपति मंदिर के कारण पूरे भारत में है। कनि का अर्थ होता है गीली भूमि और पक्कम का अर्थ होता है बहता पानी। इस तरह कनिपक्कम का शाब्दिक अर्थ है बहते पानी की भूमि। ये गांव बाहुदा नदी के किनारे बसा है। इस नदी का भी तीर्थ के लिहाज से आंध्र प्रदेश में काफी महत्व है। बाहुदा का अर्थ है भुजाएं देने वाली नदी। इस नदी को लेकर यहां एक लोक कथा प्रचलित है कि कनिपक्कम में दो भाई तीर्थ यात्रा के लिए आए थे, यहां छोटे भाई से स्थानीय राजा के सामने कोई गलती हो गई, जिसके दंड स्वरूप राजा ने उसके दोनों हाथ कटवा दिए। 


घायल भाई ने कनिपक्कम मंदिर के पास इस नदी में जब डुबकी लगाई तो उसके दोनों हाथ जुड़ गए। तभी से इस नदी का नाम बाहुदा नदी पड़ गया। कनिपक्कम मंदिर में ऐसे कई चमत्कार भी होते हैं, जब लोग मंदिर में प्रवेश के बाद पवित्र कुंड में डुबकी लगाते हुए अपनी गलतियों और पापों को स्वीकार करते हैं। यहां भगवान को सत्य का देवता माना गया है। मान्यता है कि यहां कोई भी झूठ बोलकर भगवान के दर्शन नहीं कर पाता है। 

  • तीन भाइयों को मिली थी गणेश प्रतिमा

कनिपक्कम में वरसिद्धि विनायक स्वामी की स्वयं-भू प्रतिमा को लेकर मान्यता है कि ये प्रतिमा तीन भाइयों को खेत में काम करते हुए मिली थी। तीनों भाई शारीरिक रुप से विकलांग थे। एक अंधा, एक बहरा और एक गूंगा था। एक दिन जब तीनों अपने खेत में काम कर रहे थे। तीनों ने पास के कुएं से पानी निकालने के लिए वहां खोदना शुरू किया। खोदते-खोदते अचानक उनकी कुदाली किसी पत्थर से टकराई, टकराते ही वहां से रक्त जैसी धारा बह निकली। तीनों ने डरते-डरते उस जगह को साफ करके पत्थर को निकाला तो वो एक स्वयं-भू प्रतिमा थी। प्रतिमा के निकलते ही तीनों भाइयों की बीमारी चली गई। वे सामान्य हो गए। तीनों ने कनिपक्कम में उस प्रतिमा को स्थापित कर दिया। 

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