ग्रंथों का ज्ञान / शिव महापुराण कहता है 5 तरह के होते हैं पाप, इनसे बचने के भी हैं उपाय

Lord Shiv Shiva Mahapuran says there are 5 types of sins, there are also ways to avoid them
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Lord Shiv Shiva Mahapuran says there are 5 types of sins, there are also ways to avoid them

  • मानसिक, शारीरिक के अलावा भी होते हैं 3 और पाप
  • शिवपुराण में भगवान शिव ने खुद बताया है इनके बारे में 

दैनिक भास्कर

Feb 13, 2020, 03:25 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. हमारे धर्मग्रंथों में जीवन से जुड़ी बातों का एक विशेष दृष्टिकोण और ज्ञान है। लाइन मैनेजमेंट के नजरिए से देखा जाए तो हर ग्रंथ में कुछ ना कुछ ऐसी खास बात है, जो आपको जीवन के प्रति एक नया नजरिया देगी। हिंदु धर्म ग्रंथों के 18 महापुराणों में से एक शिव महापुराण में भी जीवन से जुड़ी ऐसी ही बातें शामिल हैं। इस ग्रंथ के एक प्रसंग में भगवान शिव ने इंसान द्वारा किए जाने वाले पापों के बारे में बताया है। शिवपुराण कहता है, पाप भी 5 तरह के होते हैं। इसे बचने के तरीके भी हैं, और इनके दुष्प्रभाव भी हैं। 

  • मानसिक  

जाने-अनजाने में मनुष्य मानसिक रूप से भी पाप कर जाता है। मन में गलत विचारों का आना मानसिक पाप की श्रेणी में आता है। कई बार लोग मन ही मन में ऐसे-ऐसे गलत काम कर जाते हैं, जो हकीकत में नहीं कर सकते। मन में किस स्तर के विचार पनप रहे हैं इस पर ध्यान देना चाहिए। मन को नियंत्रित करने की क्रिया का नाम है योग/ध्यान। प्रतिदिन ध्यान की क्रिया से अवश्य गुजरें।

  • वाचिक  

कुछ लोग शब्दों का उपयोग करते समय यह नहीं सोचते कि सुनने वाले पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। किसी को दुख पहुंचाने वाली बात कहना भी वाचिक पाप की श्रेणी में आता है। कई बार परिवार में छोटे बच्चे बड़े सदस्यों को उल्टे-सीधे जवाब दे देते हैं। जब भी किसी से वार्तालाप करें तब यह ध्यान रखें कि हमारे शब्द सामने वाले को दुख तो नहीं पहुंचा रहे। हमेशा मीठी वाणी बोलना चाहिए, जिससे सुनने वाले को भी प्रसन्नता होती है।

  • शारीरिक 

हमारी प्रकृति ईश्वरीय स्वरूप है। मनुष्यों के अलावा जानवर, पेड़-पौधे भगवान की कृति हैं। कई लोग हरे-भरे वृक्षों को काट देते हैं, जानवरों की हत्या कर देते हैं, यह सब शारीरिक दोष हैं। कभी-कभी अनजाने में भी हमारे पैरों के नीचे आकर किसी छोटे से जानवर की मौत हो जाती है। ईश्वर की बनाई हर कृति का सम्मान करेंगे तो प्रकृति भी हमें बहुत कुछ देगी।

  • निंदा न करें  

आदमी को दूसरों की निंदा करने की आदत होती है। कई लोग तो यह भी नहीं देखते कि जिसकी बुराई कर रहे हैं वह तपस्वी, गुरुजन, वरिष्ठ व्यक्ति है और बुराई कर देते हैं। तपस्वी और गुरुजनों में भगवान का वास होता है। इसलिए इन्हें हमेशा सम्मान देना चाहिए।

  • गलत लोगों से संपर्क पाप है  

मदिरापान करना, चोरी करना, हत्या करना और व्यभिचार करना पाप है ही, लेकिन इन लोगों से संपर्क करना भी पाप की श्रेणी में आता है। हमारे ऋषि-मुनियों ने पाप से बचने के लिए सत्संग की व्यवस्था की है। जब भी अवसर मिले किसी अच्छे व्यक्ति के पास जाकर बैठें, ज्ञानवर्धक पुस्तक पढ़ें, भजन-कीर्तन करें।

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