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1 फरवरी, रथ सप्तमी तक अगले 15 दिन धार्मिक कार्यों के लिए बहुत ही खास

7 महीने पहले
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  • मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक के 15 दिनों का विशेष महत्व
  • इन दिनों में योग और प्राणायम होते हैं बहुत ही लाभ देने वाले

एस्ट्रोलॉजर आशुतोष चावला. ज्योतिष पंचांग के अनुसार भूलोक के एक सम्वत्सर अर्थात एक वर्ष को देव लोक की एक अहोरात्र कहा जाता है । अहोरात्र का अर्थ है दिन और रात । हमारे दो अयन, उत्तरायण और दक्षिणायन ही वह दिन और रात हैं। 15 जनवरी 2020 की सुबह (14 जनवरी की मध्य रात्रि) लगभग 2.10 बजे सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करके आने वाले छः महीनों तक उत्तरायण में गोचर होंगे। इसे हम , देवताओं के दिन की शुरुआत समझ कर सभी विवाह उपनयन आदि मंगल कार्यों को, जो कि मल मास के कारण स्थगित थे, प्रारम्भ कर सकते हैं।


जिस प्रकार भू-लोक पर किसी भी आध्यात्मिक साधना के लिए प्रातः और संध्या का विशेष महत्व होता है, उसी प्रकार मकर संक्रान्ति से ले कर रथ सप्तमी जो कि इस साल 1 फरवरी को है, यह विशेष समय रहता है सभी प्रकार  की साधना, दान पुण्य, स्नान आदि कार्यों के लिए। इन 15 दिनों में जहां तक हो सके, अपने सत्व की वृद्धि के लिए प्रयत्न करें। अपने खाने-पीने और दिनचर्या पर विशेष ध्यान दें। जहां तक ही सके मांस मदिरा आदि का पूर्णतः त्याग करें। प्रतिदिन थोड़ा योगासन, प्राणायाम और ध्यान द्वारा अपने दिन की शुरुआत करें। 


जिस प्रकार प्रातः-संध्या में की गई साधना हमारे पूरे दिन को सत्व और शुभता से भर देती है। उसी प्रकार देवताओं की इस संध्या काल में की गई साधना हमारे आने वाले सम्पूर्ण वर्ष को सत्वमयी और शुभ बनाने में सक्षम है।  इसमें भी विशेषतः मकर संक्रान्ति और रथ सप्तमी के दिन तो हम सभी को पुण्य स्थलों पर सूर्योदय के समय स्नान कर जप, ध्यान और दान आदि अवश्य करने ही चाहिए।  इन दिनों भगवान सूर्य के पूजन और स्तुति गान द्वारा अभिनंदन करने से और यथा शक्ति दान करने से हमारे भीतर के सूर्य तत्त्व की वृद्धि होती है। 


हमारे अंतः करण में जो सूर्य तत्व है, उसी से हमें प्राण ऊर्जा , हर प्रकार की नेतृत्व शक्ति  तथा प्रचुर आत्मबल की प्राप्ति होती है और सूर्य देव के ही समान दैवीय गुणों से हमारा जीवन ओतप्रोत होता है। 
दान कर्म सूर्यदेव को विशेष प्रिय हैं। दान और भी अधिक फलदायी हो जाता है, जब वह सही काल में, पात्र व्यक्ति को, सही वस्तु का किया जाए। काल तो यह उत्तम है ही, शुभ पात्रता वाले अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को शुभ वस्तुओं का अथवा ज़रूरत की वस्तुओं का दान आपको अक्षय पुण्य का भागी बनाएगा। 
मकर संक्रान्ति या उत्तरायण की महिमा का बखान तो हमारे ऐतिहासिक ग्रंथो और पुराणो के कई अध्यायों में किया गया है। महाभारत की एक कथा अनुसार पितामह भीष्म ने कई दिनों तक तीरों की शैय्या पर अपने घायल देह के साथ केवल उत्तरायण के लिए प्रतीक्षा की। 


भगवद्गीता में उत्तरायण में शरीर त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति का भी वर्णन है। देश के विभिन्न प्रांतों में इस दिवस को विशेष महत्व के साथ मनाया जाता है। गुजरात में पतंगों से सूर्यदेव का उत्तरायण में स्वागत करते हैं तो उत्तर भारत में इसे लोहरी (लोहड़ी) के नाम से अपने पूरे परिवार के साथ अग्नि के चारों ओर घूम कर, मंगल गीत गाकर मनाते हैं। बिहार मे इसे  खिचड़ी नाम से मानते हैं। वहीं, दक्षिण भारत  में पोंगल नाम से।
सभी संस्कृतियों में सूर्यदेव के अभिनंदन हेतु यह त्योहार का मनाना, इस देश की सांस्कृतिक एकता का एक सुंदर प्रतीक है। 

(लेखक आर्ट ऑफ़ लिविंग के वैदिक धर्म संस्थान के प्रमुख ज्योतिषी हैं।)

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