तीज-त्योहार / मत्स्य द्वादशी 9 को, भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार से जुड़ा है राजस्थान का सूर्यकुंड

Matsya Dwadashi on 9 December, Suryakund of Rajasthan is associated with Matsya avatar
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मान्यताओं के अनुसार पांडवों और परशुराम को सूर्यकुंड में स्नान के बाद मिली थी मुक्ति

Dainik Bhaskar

Dec 05, 2019, 03:21 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. राजस्थान के शेखावटी इलाके में उदयपुरवाटी कस्बे से करीब दस कि.मी. दूरी पर लोहार्गल नाम का स्थान है। जिसका अर्थ होता है जहां लोहा गल जाए। माना जाता है यहां पांडवों के शस्त्र गल गए थे। यह राजस्थान का पुष्कर के बाद दूसरा सबसे बड़ा तीर्थ है। मान्यताओं के अनुसार इस कुंड में भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। इसलिए मार्गशीर्ष माह के शुक्लपक्ष की मत्स्य द्वादशी और चैत्र माह के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि पर इस जलाशय की पूजा की जाती है। इस जगह का संबंध भगवन परशुराम, भगवान सूर्य और भगवान विष्णु से भी है।

  • यहां भगवान विष्णु ने लिया था मत्स्य अवतार

यह क्षेत्र पहले ब्रह्मक्षेत्र था। माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने शंखासूर नामक दैत्य का संहार करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था। शंखासूर का वध कर विष्णु ने वेदों को उसके चंगुल से छुड़ाया था। इसके बाद
इस जगह का नाम ब्रह्मक्षेत्र रखा

  • परशुराम जी ने यहां किया था प्रायश्चित

विष्णु के छठें अंशअवतार भगवान परशुराम ने क्रोध में क्षत्रियों का संहार कर दिया था, लेकिन शान्त होने पर उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ। तब उन्होंने यहां आकर पश्चाताप के लिए यज्ञ किया तथा पाप मुक्ति पाई थी।

  • यहां गले थे पांडवों के हथियार

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन जीत के बाद भी पांडव अपने परिजनों की हत्या के पाप से चिंतित थे। लाखों लोगों की हत्या के पाप का दर्द देख श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि जिस तीर्थ स्थल के तालाब में तुम्हारे हथियार
पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पाण्डव लोहार्गल आ पहुँचे तथा जैसे ही उन्होंने यहाँ के सूर्यकुण्ड में स्नान किया, उनके सारे हथियार गल गये। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव की आराधना कर मोक्ष की
प्राप्ति की।

  • सूर्यकुंड व सूर्य मंदिर की कहानी
  1. प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में संतान हुई। राजा ने विद्वानों को बुलाकर उसके पिछले जन्म के बारे में पूछा। 
  2. तब विद्वानों ने बताया कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी यानी बंदरिया थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया, क्योंकि बंदरिया का मांस अभक्ष्य होता है। 
  3. हवा और धूप के कारण वह सूख कर लोहार्गल धाम के जलकुंड में गिर गई किंतु उसका एक हाथ पेड़ पर रह गया। बाकी शरीर पवित्र जल में गिरने से वह कन्या के रूप में आपके यहां उत्पन्न हुई है। 
  4. विद्वानों ने राजा से कहा, आप वहां पर जाकर उस हाथ को भी पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। 
  5. राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ अपनेआप ही ठीक हो गया। 
  6. राजा इस चमत्कार से अति प्रसन्न हुए। विद्वानों ने राजा को बताया कि यह क्षेत्र भगवान सूर्यदेव का स्थान है। उनकी सलाह पर ही राजा ने हजारों वर्ष पूर्व यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।
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