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प्राचीन काल में होली से शुरू होकर रंगपंचमी तक मनाया जाता था रंगो का त्योहार

एक वर्ष पहले
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  • अनिष्ट शक्तियों पर जीत का त्योहार है रंगपंचमी, महाराष्ट्र में खासतौर से मनाया जाता है ये पर्व

जीवन मंत्र डेस्क. फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के पश्चात अगले दिन सभी लोग उत्साह में भरकर रंगों से खेलते हैं। रंगों का यह उत्सव चैत्र मास की कृष्ण प्रतिपदा से लेकर पंचमी तक चलता है। इसलिये इसे रंगपंचमी कहा जाता है। रंगपंचमी त्योहार चैत्रमास में कृष्णपक्ष की पंचमी पर मनाया जाता है। रंगपंचमी महाराष्ट्र का प्रमुख त्योहार है। देवी देवताओं का आह्वान करने के लिए ये त्योहार मनाया जाता है। रंगपंचमी पर पवित्र मन से पूजा पाठ करने पर देवी देवताओं का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन जो भी रंग इस्तेमाल किए जाते हैं जिन्हें एक दूसरे पर लगाया जाता है, हवा में उड़ाया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से विभिन्न रंगों की ओर देवता आकर्षित होते हैं।
  

रंगपंचमी का पौराणिक महत्व
शास्त्रों के अनुसार रंगपंचमी को अनिष्टकारी शक्तियों पर विजय पाने का पर्व कहा जाता है। माना जाता है कि त्रेता युग की शुरुआत में ही भगवान विष्णु ने धूलि वंदन किया, इसका मतलब ये कि उस समय भगवान विष्णु ने अलग-अलग रंगों के प्रयोग से तेज युक्त अवतार लिए। त्रेता युग में अवतार होने पर उसे तेजोमय यानी अलग-अलग रंगों की मदद से दर्शन के अनुरूप बनाया। इसलिए मान्यता है कि अलग-अलग रंगों को हवा में उड़ाना धूलि वंदन होता है और उन रंगों की देवीय  चमक से भगवान प्रसन्न होते हैं।

महाराष्ट्र में रंगपंचमी
रंगवाली होली यानि धुलंडी से लेकर पंचमी तिथि तक महाराष्ट्र में जमकर होली खेली जाती है। रंगों के इस पांच दिनों के महोत्सव का आखिरी दिन रंगपंचमी होता है। इस दिन देवी-देवताओं की विशेष पूजा की जाती है। पकवान बनाकर भगवान को उनका भोग लगाया जाता है। इस दिन विशेष प्रकार का मीठा पकवान भी घरों में बनाया जाता है जिसे पूरनपोली कहा जाता है। लोग अपने परिवार वालों और रिश्तेदारों के साथ ये त्योहार मनाते हैं। 

प्राचीनकाल से ही होती है रंगपंचमी
इस पर्व का इतिहास काफी पुराना है। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जब होली का उत्सव कई दिनों तक मनाया जाता था उस समय रंगपंचमी के साथ उसकी समाप्ति होती थी और उसके बाद कोई रंग नहीं खेलता था। वास्तव में रंगपंचमी होली का ही एक रूप है जो चैत्र मास की कृष्ण पंचमी को मनाया जाता है। होली का आरंभ फाल्गुन माह के साथ हो जाता है और फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन के बाद यह उत्सव चैत्र मास की कृष्ण प्रतिपदा से लेकर रंगपंचमी तक चलता है। देश के कई हिस्सों में इस अवसर पर धार्मिक और सांकृतिक उत्सव आयोजित किये जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार रंगपंचमी अनिष्टकारी शक्तियों पर विजय पाने का पर्व कहा जाता है।

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