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जीवन मंत्र डेस्क. चैत्र माह के कृष्णपक्ष की सप्तमी और अष्टमी यानी होली के बाद सातवें या आठवें दिन शीतला माता का व्रत और पूजा की जाती है। जिसे शीतला सप्तमी या शीतलाष्टमी नाम से जाना जाता है। वहीं कुछ स्थानों पर इनकी पूजा होली के बाद पड़ने वाले पहले सोमवार या गुरुवार के दिन ही की जाती है। शीतला माता का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। माना जाता है कि इनकी पूजा और ये व्रत करने से चेचक एवं अन्य तरह की बीमारियां और संक्रमण नहीं होता है।
केवल इसी व्रत में किया जाता है ठंडा भोजन
शीतला माता का ही व्रत ऐसा है जिसमें शीतल यानी ठंडा भोजन किया जाता है। इस व्रत पर एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन करने की परंपरा है। इसलिए इस व्रत को बसौड़ा या बसियौरा भी कहा जाता है। माना जाता है कि ऋतुओं के बदलने पर खान-पान में बदलाव किया जाता है। इसलिए ठंडा भोजन करने की परंपरा बनाई गई है। धर्म ग्रंथों के अनुसार शीतला माता की पूजा और इस व्रत में ठंडा भोजन करने से संक्रमण एवं अन्य तरह की बीमारियां नहीं होती।
शीतला सप्तमी और अष्टमी
शीतला सप्तमी 15 मार्च, रविवार
सप्तमी तिथि प्रारम्भ - 15 मार्च को सुबह 04:25 पर
सप्तमी तिथि समाप्त - 16 मार्च को सुबह 04:10 पर
शीतला अष्टमी 16 मार्च, सोमवार
अष्टमी तिथि प्रारम्भ - 16 मार्च को सुबह 04:11 पर
अष्टमी तिथि समाप्त - 17 मार्च को सुबह 04 बजे
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