निर्जला एकादशी / गुरुवार और एकादशी का योग 13 जून को, भगवान विष्णु के मंत्र का जाप करें और काले तिल चढ़ाएं



nirjala ekadashi 2019, nirjala ekadashi kab hai, ekadashi vrat and puja vidhi
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nirjala ekadashi 2019, nirjala ekadashi kab hai, ekadashi vrat and puja vidhi

  • भगवान विष्णु की पूजा से पहले करनी चाहिए गणेशजी की पूजा

Dainik Bhaskar

Jun 10, 2019, 06:20 PM IST

रिलिजन डेस्क। गुरुवार, 13 जून को ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। इसे निर्जला, पांडव और भीमसेनी एकादशी कहा जाता है। महाभारत काल में पांडव पुत्र भीम ने भी इस एकादशी का व्रत किया था। इस दिन निर्जल रहकर यानी बिना पानी पिए व्रत किया जाता है। गुरुवार और एकादशी का योग होने से इसका महत्व काफी अधिक बढ़ गया है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार गुरुवार का कारक ग्रह गुरु है। ये ग्रह भाग्य का कारक है और जिन लोगों की कुंडली में गुरु अशुभ स्थिति में होता है, उन्हें भाग्य का साथ नहीं मिल पाता है। जानिए गुरुवार और एकादशी के योग में भवगवान विष्णु की पूजा किस प्रकार की जा सकती है...
भगवान विष्णु के मंत्र का करें जाप - ऊँ नारायणाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।
> गुरुवार को सुबह जल्दी उठें और स्नान के बाद पीले वस्त्र पहनें।
> घर के मंदिर में सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश की पूजा करें। गणेशजी को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। गंध, फूल, चावल चढ़ाएं। 
> गणेशजी के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें। भगवान विष्णु का आवाहन करें। आवाहन यानी आमंत्रित करना। विष्णुजी के साथ ही देवी लक्ष्मी का भी आवाहन करें।
> भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को बैठने के लिए आसन दें। देवी-देवताओं को को स्नान कराएं।
> पहले जल से स्नान  कराएं, फिर पंचामृत से और एक बार फिर जल से स्नान कराएं। 
> भगवान को वस्त्र अर्पित करें। वस्त्रों के बाद आभूषण और फिर यज्ञोपवित (जनेऊ) पहनाएं। पुष्पमाला पहनाएं। 
> सुगंधित इत्र अर्पित करें। तिलक करें। तिलक के लिए अष्टगंध का प्रयोग करें।
> धूप और दीप जलाएं। भगवान विष्णु को तुलसी दल विशेष प्रिय है। तुलसी दल अर्पित करें। 
> भगवान विष्णु की पूजा में काले तिल विशेष रूप से चढ़ाएं। काले तिल से बना भोग अर्पित करें।
> अपनी श्रद्धानुसार के घी या तेल का दीपक जलाएं। नेवैद्य अर्पित करें। आरती करें। आरती के पश्चात् परिक्रमा करें। पूजा में विष्णुजी के मंत्र का जाप 108 बार करें। अंत में भगावन से पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा याचना करें।

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