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मान्यता : अगर पति-पत्नी एक साथ करते हैं तीर्थ यात्रा और पूजा-पाठ तो जल्दी पूरी हो सकती हैं मनोकामनाएं, इससे बना रहता है आपसी प्रेम

पति-पत्नी को अकेले क्यों नहीं करनी चाहिए तीर्थ यात्रा?

Dainik Bhaskar

Dec 08, 2018, 04:12 PM IST

रिलिजन डेस्क। पत्नी को अद्धांगिनी कहा जाता है यानी पत्नी पति का आधा अंग होती है। विवाह के समय दिए जाने वाले सात वचनों में से एक वचन ये भी होता है कि पति-पत्नी दोनों एक साथ ही तीर्थ यात्रा करेंगे और पूजा-पाठ करेंगे। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार इस परंपरा के पीछे पति-पत्नी के सुखी वैवाहिक जीवन का रहस्य छिपा है। यहां जानिए पति-पत्नी को एक साथ तीर्थ यात्रा और पूजा-पाठ क्यों करनी चाहिए...

> मान्यता है कि पति-पत्नी एक साथ पूजा और तीर्थ यात्रा करते हैं तो उसका पूरा पुण्य मिलता है। दोनों की मनोकामनाएं जल्दी पूरी हो सकती हैं।

> पत्नी के बिना पति को अधूरा माना जाता है। दोनों को एक साथ ही भगवान के लिए सभी कार्य करने चाहिए। अगर पति या पत्नी अकेले ही पूजन कर्म करेंगे तो उसका आधा पुण्य ही मिल पाता है।

> पति के हर काम में पत्नी हिस्सेदार होती है। इसी वजह से सभी पूजा कर्म दोनों के लिए एक साथ करने का नियम बनाया गया है।

> दोनों एक साथ तीर्थ यात्रा करते हैं तो परस्पर प्रेम भी बढ़ता है। पति-पत्नी को एक साथ रहने का मौका मिलता है।

> पत्नी को पति की शक्ति माना जाता है। इसीलिए देवताओं के नाम से पहले उनकी शक्ति का नाम लिया जाता है। जैसे सीताराम, राधाकृष्ण।

> जब पति-पत्नी तीर्थ यात्रा पर जाते हैं तो कुछ समय से सांसारिक समस्याओं को भूलकर एक-दूसरे के साथ का आनंद लेते हैं। इससे दोनों की पुरानी गलतफहमियां दूर हो सकती हैं, आपसी तालमेल बढ़ता है।

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