पोंगल 15 से 18 जनवरी तक / प्रकृति के प्रति मनुष्य के समर्पित भाव को दर्शाता है पोंगल त्योहार



pongal festival will start on 15 january 2019
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pongal festival will start on 15 january 2019

Dainik Bhaskar

Jan 09, 2019, 04:53 PM IST

रिलिजन डेस्क. पोंगल दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला एक प्रमुख पर्व है। प्रकृति का समर्पित यह त्योहार इस साल यह 15 से 18 जनवरी तक मनाया जाएगा। पोंगल शब्द के दो अर्थ होते हैं पहला उबालना और दूसरा नया साल भी है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व के चार पोंगल होते हैं। यह त्योहार फसलों की कटाई के बाद आदि काल से मनाया जा रहा है। 

इस त्योहार से जुड़ी विशेष बातें

  1. क्या होता है पोंगल में?

    इस अवसर पर नए धान का चावल निकाल कर उसका भोग बनाकर भगवान सूर्य को भोग लगाया जाता है। इस अवसर पर बैलों को सजाया जाता है और भैया दूज की तरह भाइयों के लिए बहनें लम्बी उम्र की भगवान से कामना करती हैं। गुड़ और चावल उबालकर सूर्य को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद का नाम ही पोंगल है।

चार तरह के होते हैं पोंगल

  1. पहले दिन का पोंगल

    पोंगल चार तरह के होते हैं। जो भोगी पोंगल ,सूर्य पोंगल ,मट्टू पोंगल और कन्या पोंगल हैं। पहले दिन भोगी पोंगल में इन्द्रदेव की पूजा की जाती है। इंद्रदेव को भोगी के रूप में भी जाना जाता है। वर्षा एवं अच्छी फसल के लिए लोग इंद्रदेव की पूजा करते हैं।

  2. दूसरे दिन का पोंगल 

    दूसरे दिन भगवान सूर्य की पूजा की जाती है है । इसमें नए बर्तनों में नए चावल,मूंग की दाल एवं गुड़ डालकर केले के पत्ते पर गन्ना, अदरक आदि के साथ पूजा करते हैं। सूर्य को चढ़ाए जाने वाले इस प्रसाद को सूर्य के प्रकाश में ही बनाया जाता है।

  3. तीसरे दिन का पोंगल

    तीसरे दिन को मट्टू पोंगल कहा जाता है। इस दिन शिव जी के वाहन नंदी की पूजा बैल के रूप में की जाती है। इस के पीछे मान्सता है कि नंदी से एक बार कोई भूल हो गई उस भूल के लिए भोलेनाथ ने उसे बैल बनकर पृथ्वी पर जाकर मनुष्यों की सहायता करने को कहा। उसी के याद में इस दिन बेल की पूजा की जाती है।

  4. चौथे दिन का पोंगल 

    चौथा पोंगल कन्या पोंगल है जो काली माता के मंदिर में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता। इसमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं।

प्राचीन काल से मनाया जा रहा है यह त्योहार

  1. प्राचीन काल में पोंगल को द्रविण शस्य उत्सव के रूप में मनाया जाता था। तिरुवल्लुर के मंदिर में प्राप्त शिलालेख के अनुसार किलूटूंगा राजा पोंगल के अवसर पर जमीन और मंदिर गरीबों को दान में दिया करते थे। इस अवसर पर युवको की सांड के साथ लड़ने की प्रथा थी। इस दिन कन्याओं के लिए स्वयंवर का आयोजन किया जाता है। इसमें कन्याएं वरमाला डालकर अपना पति चुनती थीं।

पोंगल की कथा

  1. पोंगल की कथा मदुरै के पति-पत्नी कण्णगी और कोवलन से जुड़ी है। एक बार कण्णगी के कहने पर कोवलन पायल बेचने के लिए सुनार के पास गया।  सुनार ने राजा को बताया कि जो पायल कोवलन बेचने आया है वह रानी के चोरी गए पायल से मिलते जुलते हैं।


    - राजा ने बिना किसी जांच के इस अपराध के लिए कोवलन को फांसी की सजा दे दी। अपने पति को फांसी से बचान के लिए कण्णगी ने शिव जी की तपस्या की और उनसे राजा के साथ-साथ उसके राज्य को नष्ट करने का वरदान मांगा।


    - जब राज्य की जनता को यह पता चला तो वहां की महिलाओं ने मिलकर किलिल्यार नदी के किनारे काली माता की आराधना की। अपने राजा के जीवन एवं राज्य की रक्षा के लिए कण्णगी में दया जगाने की प्रार्थना की।


    - माता काली ने महिलाओं के व्रत से प्रसन्न होकर कण्णगी में दया का भाव जाग्रत किया और राजा व राज्य की रक्षा की। तब से काली मंदिर में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस तरह चार दिनों के पोंगल का समापन होता है। 

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