प्रदोष / भगवान शिव-पार्वती को प्रसन्न करने और लंबी उम्र के लिए रखा जाता है ये व्रत

Dainik Bhaskar

May 15, 2019, 01:51 PM IST



Pradosh Vrat 2019: This fast is kept to please Lord Shiva and Parvati
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Pradosh Vrat 2019: This fast is kept to please Lord Shiva and Parvati

जीवन मंत्र डेस्क. हिन्दू धर्म में व्रत, पूजा-पाठ, उपवास आदि को काफी महत्व दिया गया है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने कई व्रत और तीज त्योहार होते हैं, लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत का महत्व ज्यादा है। यह व्रत 16 मई गुरुवार को किया जाएगा। प्रदोष व्रत को त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। ये व्रत एक साल में कई बार आता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह व्रत महीने में दो बार आता है। प्रदोष व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित है। शिव पुराण के अनुसार इस व्रत को करने से बेहतर स्वास्थ और लम्बी आयु प्राप्त होती है।

 

  • क्या है प्रदोष व्रत

प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर होने वाले इस व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय प्रदोष काल कहलाता है। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार त्रयोदशी तिथि पर भगवान शिव प्रदोष काल में कैलाश पर्वत स्थित अपने रजत भवन में नृत्य करते हैं। इसी वजह से लोग शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस दिन प्रदोष व्रत रखते हैं। इस व्रत को करने से सारे कष्ट और हर प्रकार के दोष मिट जाते हैं। कलयुग में प्रदोष व्रत को करना बहुत मंगलकारी होता है और शिव कृपा प्रदान करता है। 

 

  • प्रदोष व्रत के नियम और विधि

प्रदोष में व्रत में निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रातः काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल अक्षत धूप दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करें। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से पुण्य फल मिलता है।

 

1.  प्रदोष व्रत करने के लिए त्रयोदशी पर सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि के बाद साफ़ वस्त्र पहन लें।

2.  उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें।

3.  इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।

4.  पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले फिर से स्नान करें और सफ़ेद रंग के साफ कपड़े पहप लें।

5.  फिर स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें और गाय के गोबर से लीप कर मंडप तैयार कर लें।

6.  पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बनाएं।

7.  पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं।

8.  भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं।

 

  • प्रदोष व्रत का महत्व

सबसे पहले इस व्रत के महत्व के बारे में भगवान शिव ने माता सती को बताया था, उसके बाद महर्षि वेदव्यास जी ने इस व्रत के बारे में सूत जी को बताया। फिर वेदों के ज्ञानी सूतजी ने गंगा नदी के किनारे शौनकादि ऋषियों को इस व्रत का महत्व बताया था। उन्होंने कहा कलयुग में जब अधर्म बढ़ेगा, लोग धर्म से दूर होते जाएंगे तब प्रदोष व्रत एक माध्यम बनेगा जिसके द्वारा वो शिव की अराधना कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेंगे। जिससे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।  प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा करने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिव पुराण के अनुसार एक प्रदोष व्रत रखने का पुण्य दो गाय दान करने जितना होता है।

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