सीख / पति-पत्नी का एक-दूसरे के लिए होना चाहिए पूर्ण समर्पण, तभी सुखी रहता है जीवन



ramayana, ramcharit manas, shriram and sita, shriram in ayodhya
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  • श्रीराम और सीता से समझें, वैवाहिक जीवन में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए

Dainik Bhaskar

Oct 18, 2019, 11:18 AM IST

जीवन मंत्र डेस्क। पति-पत्नी के रिश्ते में तब तनाव उत्पन्न हो जाता है, जब वे एक-दूसरे की बजाय खुद को अधिक महत्व देने लगते हैं। वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव होना बहुत जरूरी है। समर्पण का भाव यानी स्वयं को और खुद की सुख-सुविधाओं को पूरी तरह से जीवन साथी को सौंप देना। स्वयं को महत्व न देते हुए जीवन साथी को महत्व देना ही समर्पण है। जब पति-पत्नी के बीच इस भाव की कमी होती है तो वैवाहिक जीवन में परेशानियां बढ़ने लगती है। रामायण में श्रीराम और सीता के वैवाहिक जीवन में एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पण का भाव था।
सीता को अयोध्या छोड़कर श्रीराम जाना चाहते थे वनवास
श्रीरामजी को वनवास जाना था, उस समय वे चाहते थे सीताजी मां कौशल्या के पास ही अयोध्या में रुके। दूसरी तरफ सीता भी श्रीराम के साथ वनवास जाना चाहती थीं। कौशल्याजी भी चाहती थीं सीता न जाए। आमतौर पर परिवार में जब ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है तो परिवार में तालमेल बिगड़ जाता है, लेकिन रामायण के इस प्रसंग में श्रीराम का धैर्य, सीता और कौशल्याजी की समझ ने सारी स्थितियां बदल दीं।
श्रीराम ने सीता को समझाया कि वन में कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ेगा। वहां भयंकर राक्षस होंगे, सांप होंगे, वन की धूप, ठंड और बारिश भी भयानक होती है, समय-समय पर मनुष्यों को खाने वाले जानवरों का सामना करना पड़ेगा, तरह-तरह की विपत्तियां आएंगी। इन सभी परेशानियों का सामना करना तुम्हारे जैसी सुकोमल राजकुमारी के लिए बहुत ही मुश्किल होगा। इस प्रकार समझाने के बाद भी सीता नहीं मानीं और वनवास में साथ जाने के लिए श्रीराम और माता कौशल्या को मना लिया। सीता ने श्रीराम के प्रति समर्पण का भाव दर्शाया और अपने स्वामी के साथ वे भी वनवास गईं। समर्पण की इसी भावना की वजह से श्रीराम और सीता का वैवाहिक जीवन दिव्य माना गया है। आज भी जिन परिवारों में पति-पत्नी के बीच समर्पण की भावना होती है, वहां सुख बना रहता है।

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