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ऋषि पंचमी / जाने-अनजाने में हुए पापों से बचने के लिए महिलाओं को करना चाहिए यह व्रत



rishi panchami on 14 september
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rishi panchami on 14 september

Dainik Bhaskar

Sep 13, 2018, 11:16 AM IST

रिलिजन डेस्क. शुक्रवार, 14 सितंबर 2018 को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है, इसे ऋषि पंचमी कहा जाता है। ये तिथि महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखती है। ऋषि पंचमी पर किए गए व्रत से जाने-अनजाने में हुए पापों के दोष दूर होते हैं। मान्यता है कि स्त्रियों को पीरियड्स (माहवारी) के दिनों में कई प्रकार के दोष लगते हैं। कई बार स्त्रियां इन दिनों में घर के मंदिर में चली जाती हैं, तुलसी को स्पर्श कर देती हैं, ऐसी ही दोषों का असर खत्म करने के लिए ऋषि पंचमी पर सप्त ऋषियों की पूजा होती है और पापों के लिए क्षमा याचना की जाती है। इसीलिए इसे ऋषि पंचमी कहा जाता है।

व्रत विधि और कथा

  1. पूजा विधि 

    प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करें।

     
    - घर के स्वच्छ स्थान पर हल्दी, कुमकुम, रोली आदि से चौकोर मंडल (चोक) बनाकरक उस पर सप्तऋषि की स्थापना करें। 


    - शुद्ध जल एवं पंचामृत से स्नान कराएं। 


    - चन्दन का टीका, पुष्प माला व पुष्प अर्पित कर यग्योपवीत (जनेऊ) पहनाएं। 


    - ऋषि पंचमी पर सफेद वस्त्र पहनकर पूजा-पाठ करनी चाहिए और किसी ब्राह्मण से ऋषि पंचमी की कथा सुननी चाहिए।


    - अगरबत्ती, धूप, दीप आदि जलाएं। पूर्ण भक्ति भाव से प्रणाम करें।


    - ऋषि पंचमी पर महिलाओं को अनाज, सब्जी और नमक का सेवन करने से बचना चाहिए। इस दिन मोरधन का सेवन किया जाता है।


    - इस व्रत के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया जाता है।


    - ऋषि पंचमी पर देवी अंरुधती की भी पूजा करनी चाहिए।


    - इस व्रत में महिलाएं अपामार्ग पौधे के तने से दातुन और स्नान करती हैं। ऐसा करने से महिलाओं के सभी पापों के दोष खत्म हो जाते हैं।

  2. ऋषि पंचमी व्रत कथा

    सतयुग में विदर्भ नगरी में श्येनजित नामक राजा हुए थे जो ऋषियों के समान ही थे। उनके राज में एक सुमित्र नाम का किसान अपनी पत्नी जयश्री के साथ रहता था। 


    - वर्षा ऋतु में जब जयश्री खेत में काम कर रही थी तो उसे रजस्वला (माहवारी) होने लगी । उसको रजस्वला होने का पता लग गया था फिर भी वह घर के काम में लगी रही। 


    - कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई। तब जयश्री अपने अगले जन्म में कुतिया और सुमित्र को रजस्वला स्त्री के सम्पर्क में आने के कारण बैल की योनी मिली।


    - इन दोनों को ही अपने पिछले जन्म के बारे में याद था। वे दोनों कुतिया और बैल के रूप में उसी नगर में अपने बेटे सुचित्र के यहां रहने लगे। धर्मात्मा सुचित्र अपने अतिथियों का हमेशा सत्कार करता था। 


    - अपने पिता के श्राद्ध के दिन उसने ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलवाया। जब उसकी स्त्री किसी काम के लिए रसोई से बाहर गई हुई थी तो एक सर्प ने रसोई की खीर के बर्तन में विष उगल दिया। कुतिया के रूप में सुचित्र की मां कुछ दूर से सब देख रही थी।


    - पुत्र की पत्नी के आने पर उसने अपने पुत्र को ब्रह्म हत्या के पाप से बचाने के लिए उस बर्तन में मुंह डाल दिया। यह देख सुचित्र की पत्नी चन्द्रवती ने चूल्हे में से जलती लकड़ी निकाल कर कुतिया को मारी। जिससे वो वहां से भाग गई।


    - आम दिनों घर की झूठन बचने पर चन्द्रवती उस कुतिया को डाल देती थी, लेकिन इस दिन उसने उसे झेक दिया। सब भोजन का सामान फिकवा कर बर्तन साफ करके दोबारा शुद्ध भोजन बना कर ब्राह्मणों को खिला कर विदा किया।


    - रात को भूख से व्याकुल होकर वह कुतिया बैल के पास पहुची और उसे सारी बात बताई। वह भूख से व्याकुल थी। बैल बोला, तुम्हारे पाप के कारण तो मैं भी इस योनी में आ पड़ा हूं और आज बोझा ढ़ोते-ढ़ोते मेरी कमर ही टूट गई है। 


    - आज मैं भी खेत में दिनभर हल में जुता रहा। मेरे पुत्र ने आज मुझे भी भोजन नहीं दिया और मुझे मारा भी बहुत। मुझे इस प्रकार कष्ट देकर उसने इस श्राद्ध को निष्फल ही कर दिया।


    - अपने माता-पिता की इन बातों को सुचित्र सुन रहा था, उसने तत्काल उसी समय दोनों को भरपेट भोजन कराया और फिर उनके दुख से दुखी होकर जंगल की ओर चला गया। 


    - जंगल में जाकर सर्वातमा ऋषियों से पूछा कि मेरे माता-पिता के किन पाप कर्मों के कारण वे नीच योनि को प्राप्त हुए हैं और अब किस प्रकार से इनको छुटकारा मिल सकता है।  


    - तब सर्वतमा ऋषि बोले तुम इनकी मुक्ति के लिए पत्नी सहित ऋषि पंचमी का व्रत धारण करो तथा उसका जो भी फल मिले उसे संकल्प से अपने माता-पिता को दो।


    - भाद्रपद महीने की शुक्ल पंचमी को मुख शुद्ध करके मध्याह्न के समय में नदी के पवित्र जल में स्नान करना और नए रेशमी वस्त्र धारणकर पत्नी सहित सप्तऋषियों का पूजन करना। 


    -  इतना सुनकर सुचित्र अपने घर लौट आया और अपनी पत्नी सहित विधि-विधान और नियम-संयम से व्रत-पूजन किया। उसके पुण्य से माता-पिता दोनों पशु योनियों से छूट कर बैकुंठ धाम को गए। इसलिए जो महिला श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत करती है, वह समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर बैकुंठ को जाती है। 

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