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तीर्थ दर्शन / वीजा और पासपोर्ट के लिए लोग शहीद बाबा निहाल सिंह के गुरुद्वारे में चढ़ाते हैं हवाई जहाज



shaheed baba nihal singh gurdwara in jalandhar
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shaheed baba nihal singh gurdwara in jalandhar
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Dainik Bhaskar

Nov 24, 2018, 10:30 AM IST

रिलिजन डेस्क. भारत में देवी-देवताओं के लाखों मंदिर और सिखों के गुरुद्वारे हैं। इन मंदिर-गुरुद्वारों में करोड़ों लोग अपने अराध्‍य को तरह-तरह के भोग और प्रसाद चढाते हैं, जहां सबकी मान्‍यताएं और परंपराएं भी अलग-अलग हैं। आज हम आपको ऐसे गुरुद्वारे के बारे में बता रहे हैं, जहां प्रसाद के रूप में हवाईजहाज अर्पित किया जाता है। जालंधर के शहीद बाबा निहाल सिंह का गुरुद्वारा में कोई खाने वाला प्रसाद नही चढ़ाया जाता बल्कि प्रसाद के तौर पर खिलौने वाले हवाई जहाज को चढ़ावे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इस गुरुद्वारे को हवाई जहाज गुरुद्वारे के नाम से भी जाना जाता है।

गुरुद्वारे से जुड़ी खास बातें

  1. क्या है परंपरा?

    यहां के स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि आप विदेश जाना चाहते हैं और आपका वीजा या पासपोर्ट नहीं बन पा रहा है तो, आप यहां पर आकर फरियाद करें और “खिलौने वाला हवाई जहाज” दान करें तो आपकी विदेश यात्रा की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं। 

  2. बच्चों का बांट दिए जाते हैं ये खिलौने

    गुरुद्वारा सूत्रों के अनुसार चढे़ हुए हवाई जहाजों को गुरुद्वारे में दर्शन के लिए आने वाले आस-पड़ोस के बच्चों को बांट दिया जाता है। गुरुद्वारे के बाहर दुकानों में बड़ी संख्या में हवाई जहाज बिकता है दुकानदार हरमिंदर सिंह का कहना है कि अन्य दिनों की अपेक्षा रविवार को अधिक बिकते है।

  3. लड़कियां की संख्या में इजाफा

    गुरुद्वारा साहिब में वैसे तो जहाज चढ़ाने वालों में ज्यादातर लड़के होते हैं लेकिन कुछ समय से लड़कियों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है। सामान्य दिनों में एक महीने में 1000 से अधिक जहाज संगत द्वारा चढ़ाए जाते हैं।

  4. कौन थे  शहीद बाबा निहालसिंह ?

    बाबा निहालसिंह ओजार बनाने वाले कारीगर थे। वो लोहे से नलकूप में लगने वाले सामान बनाया करते थे। और गाँव वाले मानते थे की उनके हाथ के बने हुए नलकूप का पानी कभी नहीं सूखता था। ऐसे ही काम करते हुए एक दुर्घटना में उनकी मुर्त्यु हो गयी तभी से उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया और उनकी समाधी पर इस गुरुद्वारे का निर्माण करवाया गया। यह गुरुद्वारा कम से कम 150 साल से भी ज्यादा पुराना है।

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