बंगाल पूजा / दशमी पर सिंदूर खेलकर की जाती है सुहाग की लम्बी उम्र की प्रार्थना



sindoor khela puja on Dashmi in bangal
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sindoor khela puja on Dashmi in bangal

  • दुर्गा पूजा के आखिरी दिन मां ससुराल के लिए होती हैं विदा

Dainik Bhaskar

Oct 07, 2019, 05:19 PM IST

जीवन मंत्र डेस्क. बंगाली समाज में नवरात्रि के नौ दिन पूजा-पाठ के बाद दशमी के दिन सिंदूर खेलने की परंपरा है, इसे सिंंदूर खेला के नाम से जाना जाता है। इस दिन शादीशुदा महिलाएं एक-दूसरे के साथ सिंदूर की होली खेलती हैं। ऐसी मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा 10 दिन के लिए अपने मायके आती हैं। इसलिए जगह-जगह उनके पंडाल सजते हैं। इन नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा और अाराधना की जाती है और दशमी पर सिंदूर की होली खेलकर मां दुर्गा को विदा किया जाता है। 

 

  • नवरात्रि पर जिस तरह लड़की के अपने मायके आने पर उसकी सेवा की जाती है, उसी तरह मां दुर्गा की भी खूब सेवा की जाती है। दशमी के दिन मां दुर्गा के वापस ससुराल लौटने का वक्त हो जाता है तो उन्हें खूब सजाकर और सिंदूर लगा कर विदा किया जाता है। आपस में सिंदूर की होली खेलने से पहले पान के पत्ते से मां दुर्गा के गालों को स्पर्श किया जाता है। फिर उनकी मांग और माथे पर सिंदूर लगाया जाता है। इसके बाद मां को मिठाई खिलाकर भोग लगाया जाता है। फिर सभी महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर लंबे सुहाग की कामना करती हैं।

 

  • नम आंखों से देवी मां को देते हैं विदाई

वैसे तो सिंदूर खेला की रस्म केवल शादीशुदा महिलाओं के लिए ही होती है मगर कुंवारी लड़कियां भी अब इस रस्म को निभाती हैं ताकि उन्हें अच्छा और मन पसंद वर मिल सके। यह सुहाग की लंबी आयु की कामनाओं का प्रतीक है। इस रस्म को निभाते वक्त पूरा माहौल उमंग और मस्ती से भर जाता है। इसके थोड़ी देर बाद मां को विसर्जि त करने का वक्त आ जाता है और सभी नम आंखों से ‘मां चोले छे ससुर बाड़ी अर्थात मां चली ससुराल गीत गाने लगते हैं और अगले वर्ष उनके आने की कामना करते हुए विसर्जि त कर देते हैं।

 

  • शक्ति बढ़ाने के लिए धुनुची नृत्य

दुर्गा पूजा में धुनुची नृत्य खास है। धुनुची मिट्टी से बना बर्तन होता है जिसमें नारियल के छिलके जलाकर मां की आरती की जाती है। धुनुची नृत्य असल में शक्ति नृत्य है। बंगाल पूजा परंपरा में यह नृत्य मां भवानी की शक्ति और ऊर्जा बढ़ाने के लिए किया जाता है। धुनुची में नारियल की जटा व रेशे (कोकोनट कॉयर) और हवन सामग्री (धुनी) रखी जाती है। उसी से आरती की जाती है। धुनुची नृत्य सप्तमी से शुरू होता है और नवमी तक चलता है।

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