सूर्यग्रहण के बारे में क्या कहता है धर्म, विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र

3 वर्ष पहले
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जीवन मंत्र डेस्क. साल 2019 का दूसरा सूर्य ग्रहण मंगलवार 2 जुलाई को लगने वाला है. ये सूर्यग्रहण भारतीय मानक समयानुसार 2 जुलाई की रात लगभग 10 बजकर 25 मिनट पर प्रारंभ होगा। वहीं, ग्रहणकाल का सूतक लगभग 12 घंटे पहले लगेगा। इससे पहले 5-6 जनवरी को साल 2019 का पहला सूर्यग्रहण लगा था। आज हो रहे पूर्ण सूर्यग्रहण के बाद 26 दिसंबर को तीसरा और साल का आखिरी सूर्यग्रहण पड़ेगा। जो कि भारत में दिखाई देगा। 

 

  • विज्ञान की नजर से सूर्य ग्रहण 

विज्ञान के अनुसार, सूर्यग्रहण के दौरान खतरनाक सोलर रेडिएशन निकलता है. यह सोलर रेडिएशन आंखों के नाजुक टिशू को नुकसान पहुंचा सकता है. इससे आपकी आंखें खराब भी हो सकती हैं.  इसे रेटिनल सनबर्न के नाम से जाना जाता है। सूर्य ग्रहण पर की जा रही लम्बी रिसर्च से यह सामने आया है कि प्रत्येक वर्ष में कम से कम सूर्य ग्रहण की घटना देखने को मिलती है. सूर्य एक प्राकृ्तिक अद्धभुत घटना है. पूरे सौ सालों में इस प्रकार दो सौ से अधिक सूर्य ग्रहण होने की संभावनाएं बनती है. यह आवश्यक नहीं है कि होने वाले सभी सूर्य ग्रहणों को भारत में देखा जा सके, अपितु इनमें से कुछ ही भारत में देखे जा सकेगें।

 

  • ज्योतिष के अनुसार ग्रहण

काशी के ज्योतिषाचार्य पं गणेश मिश्रा के अनुसार, एक साल में तीन या तीन से अधिक ग्रहण शुभ नहीं माने जाते हैं। बताया जाता है, अगर ऐसा होता है तो प्राकृतिक आपदाएं और सत्ता परिवर्तन देखने को मिलता है। ग्रहण से राजा तथा प्रजा में से किसी एक को काफी नुकसान होता है। सूर्यग्रहण पर कुंडली में सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में आ जाते हैं और इन पर राहु-केतु की दृष्टि पर पड़ने लगती है। चहीं चंद्रग्रहण पर सूर्य और चंद्रमा आमने-सामने आ जाते हैं और इनके साथ राहु एवं केतु भी होते हैं। ग्रहों की ये स्थिति मानसिक तनाव बढ़ाने वाली होती है। इसके प्रभाव से लोगों में अनजाना डर रहता है और लोग गलत फैसले भी लेने लगते हैं।

 

  • सूर्यग्रहण का धार्मिक महत्व

मत्स्य पुराण में सूर्य ग्रहण को लेकर काफी जानकारी मिलती है। इस पुराण के अनुसार, सूर्य ग्रहण का संबंध राहु-केतु और उनके द्वारा अमृत पाने की कथा से है। सागर मंथन के बाद जब अमृत बांटा जाने लगा तब स्वरभानु नाम का असुर अमृत पीने की लालसा में रूप बदलकर सूर्य और चंद्र के मध्य बैठ गया लेकिन दोनों देवताओं ने इसे पहचान लिया और इसकी शिकायत भगवान विष्णु से कर दी। लेकिन तब तक स्वरभानु अमृत पान कर चुका था और अमृत उसके गले तक आ गया था।। जैसे ही सूर्य और चंद्र ने इसकी शिकायत की, यह दोनों देवताओं को लीलने के लिए दौड़े। भगवान विष्णु ने एक पल गंवाए बिना अपने सुदर्शन चक्र स्वरभानु असुर का सिर धड़ से अलग कर दिया। यह असुर अमृत पी चुका था इसलिए मरकर भी जीवित रहा। इसका सिर राहु कहलाया गया और धड़ केतु।  कथा के अनुसार, उस दिन से जब भी सूर्य और चंद्रमा पास आते हैं तब राहु-केतु के प्रभाव से ग्रहण लग जाता है।
 

  • सूर्य ग्रहण को लेकर क्या है मान्यता

सूर्य ग्रहण को लेकर हमारे देश में कई प्रकार की मान्यताएं हैं. मान्यता के अनुसार, ग्रहणकाल में किसी भी देवी-देवता का मूर्ति को छूना नहीं चाहिए. देवी-देवताओं की मूर्ति के अलावा ग्रहण में किसी पौधे की पत्तियों को नहीं छूना चाहिए। एक मान्यता के अनुसार ग्रहण काल में सब्जी काटना, सूई धागा से काम करने से जन्म लेने वाले शिशु में शारीरिक दोष होनेकी संभावना ज्यादा रहती है. कहा जाता है कि  सूर्य ग्रहण के समय में सूरज को खुली आंखों से नहीं देखना चाहिए।

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